श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें350 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 14/3-8 ]
अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुके जीवन-स्वरूप केवल वे ही उसे समझकर उसका वर्णन कर सकते
श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीगौरहरिके हैं॥ ६॥
प्रियतम श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, जय हो॥ ३॥
श्रीस्वरूप और श्रीरघुनाथ-इन दो प्रभुओंका कड़चा ही
चैतन्यचरित-वर्णन करनेके लिये गौरलीलाको वर्णित करनेका मूल-ग्रन्थ :—
गौरभक्तोंसे कृपा-याचना :— स्वरूप-गोसाञि आर रघुनाथ-दास।
जय स्वरूप, श्रीवासादि प्रभुभक्तगण। एइ दुइर कड़चाते ए-लीला प्रकाश ॥ ७॥
शक्ति देह',—करि येन चैतन्यवर्णन ॥ ४॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी और श्रीरघुनाथदास
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीवासादि महाप्रभुके गोस्वामी—इन दोनोंके कड़चामें ही महाप्रभुकी विरह-उन्मादकी
भक्तोंकी जय हो। आप मुझे शक्ति प्रदान करें, जिससे दशाकी गम्भीर लीलाओंका प्रकाश हुआ है॥ ७॥
मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओंका वर्णन कर सकूँ॥ ४॥
अनुभाष्य—श्रीदामोदर-स्वरूप और श्रीरघुनाथदास
गौरकृपाके बिना महाविद्वान् व्यक्तिके लिये भी महाप्रभुके गोस्वामीके कड़चा अर्थात् निदर्शन-ज्ञापिका (प्रमाणित
अप्राकृत दिव्योन्मादको समझनेमें असमर्थता :— करनेवाली) टिप्पणियोंमें ही महाप्रभुकी इन गम्भीर
प्रभुर विरहोन्माद-भाव—गम्भीर। लीलाओंके उद्देश्य सूचित हुए हैं। जो इन दो
बुझिते ना पारे केह, यद्यपि हय 'धीर' ॥ ५॥ गौरपार्षदोंके श्रीचरणोंका परित्याग करके अपनी-अपनी
अनुवाद—महाप्रभुका विरह-उन्मादरूपी भाव अत्यन्त इन्द्रियोंके सुखकी लालसासे मायामय संसारमें, गौरभक्तिका
गम्भीर है, प्राकृत बुद्धिमान व्यक्ति भी उसे नहीं समझ नाम लेकर मनोधर्मके द्वारा चालित होकर 'रङ्ग-बिरङ्ग'
सकता ॥ ५॥ जैसे घूमते रहते हैं, वे श्रीमहाप्रभुकी लीलाको समझनेमें
असमर्थ होकर गौरसेवासे विमुख होते हैं॥ ७॥
अनुभाष्य—श्रीमहाप्रभुके कृष्णविरहसे उत्पन्न अप्राकृत
अलौकिक गम्भीर उन्माद-भावको बुद्धिमान् व्यक्ति श्रीस्वरूप और श्रीरघुनाथ-दोनों प्रभुओंके
अपने-अपने अक्षजज्ञानके द्वारा नहीं समझ पायेंगे। प्रमाणिक होनेका कारण :—
वर्तमान समयमें नये भक्त-अभिमानियोंमें भक्तिसिद्धान्त- सेकाले ए दुइ रहेन महाप्रभुर पाशे।
विरुद्ध व्यभिचारी 'नदीया-नागरी'-भाव और विष्णुप्रियादेवीकी आर सब कड़चा-कर्त्ता रहेन दूरदेशे ॥ ८॥
अभिनव कल्पित उपासना उनके गौरलीलामें प्रवेशके
अभावको ही प्रकाशित करते हैं॥ ५॥ अनुवाद—महाप्रभुकी जब जगन्नाथ पुरीमें
विरह-उन्मादकी दशा प्रकाशित हो रही थी, उस समय
महाप्रभुकी कृपाके बलसे ही महाप्रभुकी श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरघुनाथदास गोस्वामी ही उनके
अप्राकृत-लीलाकी उपलब्धि :— साथ रहते थे। अपने-अपने कड़चामें महाप्रभुकी
बुझिते ना पारि याहा, वर्णिते के पारे? लीलाओंको लिखनेवाले अन्य सभी भक्त अन्यान्य दूर
सेइ बुझे, वर्णे, चैतन्य शक्ति देन याँरे ॥ ६॥ स्थानोंपर रहते थे॥ ८॥
अनुवाद—महाप्रभुके भावोंकी गम्भीरता जो समझ अनुभाष्य—इस पद्यसे यह जाना जाता है कि
ही नहीं सकता, वह उसका कैसे वर्णन कर सकता श्रीरघुनाथ और अन्यान्य अनेक भक्तोंने महाप्रभुकी
है? श्रीचैतन्य महाप्रभु जिन्हें शक्ति प्रदान करते हैं, अन्तिम दिव्योन्माद-लीलाके सम्बन्धमें बहुत-सी कथाएँ