सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2357, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2357

340 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/75-84 ]
मुखे तार झाल गेल, जिह्वा करे ज्वाला।
वृन्दावनेर ‘पीलु’ खाइते एइ एक लीला ॥ ७६ ॥
अनुवाद—जो भक्त पीलूफलको खाना जानते थे, वे
तो गुठलीको चूसने लगे। जो गौड़देशके भक्त इस
फलको खाना नहीं जानते थे, वे पीलूको चबाकर खाने
लगे। तीखी मिर्चके समान स्वादसे उनकी जिह्वा जलने
लगी। वृन्दावनके पीलूको खानेकी यह भी महाप्रभुकी
एक लीला है ॥ ७५-७६ ॥
वृन्दावनसे श्रीजगदानन्दके आनेसे सभीको प्रसन्नता :-
जगदानन्देर आगमने सबार उल्लास।
एइमते नीलाचले प्रभुर विलास ॥ ७७ ॥
अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितके लौट आनेसे सभी
भक्तोंको उल्लास हुआ। इस प्रकार महाप्रभु नीलाचलमें
अपना लीला-विलास कर रहे थे ॥ ७७ ॥
महाप्रभु और गुर्जरी-रागिनीमें गायिका देवदासीके वृत्तान्तका
वर्णन; श्रीकृष्णसे सम्बन्धित पदको श्रवण करके महाप्रभुके
द्वारा अर्द्धबाह्य दशामें प्रेमावेशमें अप्राकृत श्रीकृष्णसेवा-
बुद्धिसे उनके साथ मिलनेके लिये दौड़ना :-
एकदिन प्रभु यमेश्वर-टोटा याइते।
सेइकाले देवदासी लागिला गाइते ॥ ७८ ॥
गुर्जरीरागिनी लञा सुमधुर-स्वरे।
‘गीतगोविन्द’-पद गाय जगमोहनेरे ॥ ७९ ॥
अनुवाद—एकदिन जब महाप्रभु गदाधर पण्डितको
प्रदत्त स्थान यमेश्वर-उद्यानकी ओर जा रहे थे, उस
समय कोई एक देवदासी समस्त जगत्वासियोंके मनको
हरनेवाले ‘गीत-गोविन्द’के पदका गुर्जरी रागिनीमें अत्यन्त
मधुर स्वरसे गान करने लगी ॥ ७८-७९ ॥
दूरे गान शुनि’ प्रभुर हइल आवेश।
स्त्री, पुरुष, के गाय, —ना जानि’ विशेष ॥ ८० ॥
अनुवाद—दूरसे ही गानको सुनकर महाप्रभुमें आवेश
आ गया। उस आवेशमें वे यह भी नहीं जान पाये
कि गान कोई स्त्री कर रही है अथवा कोई पुरुष ॥ ८० ॥
तारे मिलिवारे प्रभु आवेशे धाइला।
पथे ‘सिजेर बाड़ी’ हय, फुटिया चलिला ॥ ८१ ॥
अनुवाद—महाप्रभु गान करनेवालेसे मिलनेके आवेशमें
दौड़ने लगे। मार्गमें काँटोंकी एक मेड़ थी, महाप्रभु
उसीके बीचसे दौड़े चले गये ॥ ८१ ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘सिजेर बाड़ी’,—उड़ीसामें पुष्पोंके
उद्यानको ‘फुलबाड़ी’ कहते हैं। वहाँपर काँटेकी झाड़ी
अर्थात् मनसा-काँटा और काँटे-ही-काँटे वाली झाड़ियाँ
रहती हैं, उसीको ‘सिजेर बाड़ी’ (काँटेवाली मेड़) कहते
हैं। ‘बाड़ी’का अर्थ—मेड़ है ॥ ८१ ॥
आत्म-विभोर महाप्रभुकी रक्षाके लिये
श्रीगोविन्दका उनके पीछे दौड़ना :-
अङ्गे काँटा लागिल, किछु ना जानिला !
आस्ते-व्यस्ते गोविन्द ताँर पाछेते धाइला ॥ ८२ ॥
अनुवाद—आवेशके कारण महाप्रभुको यह भी नहीं
अनुभव हुआ कि उनके अङ्गोंमें काँटे चुभे हैं।
श्रीगोविन्द भी तुरन्त द्रुतगतिसे उनके पीछे दौड़ने
लगे ॥ ८२ ॥
श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुको सावधान
करके बाह्यदशामें लाना :-
धाञा यायेन प्रभु, स्त्री आछे अल्पदूरे।
“स्त्री-गान” बलि’ गोविन्द प्रभुरे कैला कोले ॥ ८३ ॥
अनुवाद—महाप्रभु दौड़े जा रहे थे और वह स्त्री
बस थोड़ी दूरीपर ही थी कि श्रीगोविन्दने—“स्त्री गान
कर रही है”—कहकर महाप्रभुको अपनी भुजाओंमें भर
लिया ॥ ८३ ॥
आश्रयजातीय-भावसे युक्त महाप्रभुका जगद्गुरुत्व आचार्यत्व;
‘गौरनागरी’-वादका खण्डन; महाप्रभुका लौटना :-
स्त्री-नाम शुनि’ प्रभुर बाह्य हइला।
पुनरपि सेइ पथे बाहुड़ि’ चलिला ॥ ८४ ॥