श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें332 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 13/41-42 ]
इस प्रकार कुछ दिन चलते-चलते सोचता रहता
कि मैं वृन्दावनमें जा रहा हूँ और सदा महाप्रभुके
चिन्तनमें विभोर रहता। जब रात हो जाती तो किसी
वृक्षके नीचे सो जाता। एक बार मुझे घोर निद्रा आ
गयी। और जिसका सदा चिन्तन कर रहा था उसीका
स्वप्नमें दर्शन करने लगा और उसीमें विभोर हो गया।
स्वप्ने बहु दूरे गिया, सिन्धुतटे प्रवेशिया,
देखि गोरार अपूर्व नर्तन।
गदाधर नाचे सङ्गे, भक्तगण नाचे रङ्गे,
गाय गीत अमृतवर्षण॥
स्वप्नमें देखा कि अब मैं समुद्रके तटपर आ गया
हूँ। वहाँ गौरचन्द्र नृत्य कर रहे हैं। भक्तलोग भी नाच
रहे हैं और गदाधर पण्डित भी। स्वरूप दामोदर,
रायरामानन्द आदि अपूर्व रसकी वर्षा करते हुए कीर्तन
कर रहे हैं।
नृत्यगीत-अवसाने, गोरा मोर हात टाने,
बले, “तुमि क्रोधे छाड़ि गेले।
आमार कि दोष बल, तव चित्त सुचञ्चल,
व्रजे गेले आमा हेथा फेले॥'
जब नृत्यगीत समाप्त हुआ, तब महाप्रभु मेरे
निकट आये और मेरे हाथको पकड़कर बोले,- 'तुम
क्रोध करके मुझे अकेला छोड़कर चले गये। मेरा क्या
दोष था कि मुझे छोड़कर चले गये? तुम्हारा चित्त
बहुत चञ्चल है। मुझे यहाँपर छोड़कर तुम अकेले
वृन्दावन चले गये।'
आइस आलिङ्गन करि, तब वक्षे वक्ष धरि',
छाँड़ो मुञि चित्तेर विकार।
मध्याह्ने करिया पाक, देह मोरे अन्न शाक,
क्षुन्निवृत्ति हउक् आमार ॥
गौरचन्द्र मेरा आलिङ्गन करके कहने लगे,-'तुम
अपने चित्तमें मेरे प्रति क्रोधको छोड़ दो। तुम भी दुःख
पा रहे हो और मैं भी दुःख पा रहा हूँ। दोपहर हो
गयी है और मुझे भूख लग रही है। तुम्हारे चले
जानेपर कौन भोजन बनायेगा और कौन मुझे खिलायेगा ?
जैसा शचीमाता बनाती है, वैसा ही चावल-शाक
बनाकर खिलाओ जिससे मेरी तृप्ति हो।
छाड़िया जगदानन्दे, मोर मन निरानन्दे,
भोजनादि लइल कत दिन।
कि बुझिया गेले तुमि, दुःखेते पड़िनु आमि,
जगा मोरे सदा दयाहीन॥
मुझे भोजन किये हुए कितने दिन हो गये। हे
जगदानन्द! तुम्हें छोड़कर मैं आनन्द रहित हो गया हूँ।
क्या समझकर तुम मुझे छोड़कर चले गये? तुम
जानते नहीं कि मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता और
तुम भी मेरे बिना नहीं रह सकते। ओ जगा! तुम बड़े
निष्ठुर हो। तुम क्या नहीं जानते कि तुम्हारे भोजन
नहीं बनानेसे मैं नहीं खा सकता?
शीघ्र व्रज निरखिया, आइस तुमि सुखी हञा,
मोरे देह शाकान्न व्यञ्जन।
तबे त' बाँचिव आमि, ता'ते सुखी हबे तुमि,
क्रोधे मोरे ना छाड़ कखन॥
तुम व्रजके दर्शन करके शीघ्र ही लौटकर आ
जाओ। तुम्हारे आनेसे ही मैं सुखी होऊँगा। मुझे शाक,
चावल, तरकारी आदि दो। क्रोध करके मुझे कभी
छोड़कर मत जाना।'
इसके बाद मेरी निद्रा भङ्ग हो गयी और देखा कि
अभी व्रजभूमि बहुत दूर है।”
यह वास्तविक प्रेम है। ऐसा ही प्रेम यदि शिष्यका
गुरुसे होगा तो यह बढ़ते-बढ़ते श्रीकृष्ण तक जायेगा।
जब शिष्यकी ऐसी दशा हो कि वह अनुभव करे कि
मैं गुरु और श्रीकृष्णकी सेवा नहीं कर पा रहा हूँ तो
मैं क्यों प्राण धारण कर रहा हूँ, तब यह समझना
चाहिये कि शिष्यके अन्दर कृष्णप्रेम उदित हुआ
है।—“श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी महाराज” ॥ 41 ॥
भक्तोंसे विदायी लेकर काशी-आगमन :-
सब भक्तगण-ठाञि आज्ञा मागिला।
वनपथे चलि' चलि' वाराणसी आइला ॥ 42 ॥