श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 9/140-146 नौवाँ अध्याय 267
सिद्ध गौरदासोंको गृहस्थ और संन्यास-वेशसे निरपेक्ष
रहकर सभी अवस्थाओंमें कृष्णभजनकी शिक्षा प्रदान :-
महाविषय कर, किबा विरक्त उदास।
जन्मे जन्मे तुमि पञ्च-मोर 'निजदास' ॥ 141 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने कहा,-"जब तुम पाँचों भाई
ही संन्यासी बन जाओगे, तब फिर तुम लोगोंके इतने
बड़े परिवारका भरण-पोषण कौन करेगा? तुम सब बड़े
विषय कार्य करो अथवा विषयोंसे पूर्ण विरक्त हो जाओ,
तुम पाँचों भाई जन्म-जन्मान्तरमें मेरे 'नित्यदास'
हो॥ 140-141 ॥
अनुभाष्य-मैं-भगवान्का नित्य-निजदास हूँ ऐसा
शुद्ध अभिमान होनेपर-बाहरीरूपसे संन्यास-ग्रहण अथवा
बाहरीरूपसे बृहत् विषयोंकी सेवा,-कुछ भी जीवका
बाहरी अमङ्गल नहीं कर पाते; क्योंकि कृष्णसुखको
भूलकर लौकिक निज-भोग-परायण होनेपर ही जीवोंका
बन्धन होता है और कृष्णसेवापरायण अप्राकृत होनेपर
गृहमें रहनेपर भी महासंन्यास होता है; उस अवस्थामें
सब समय कृष्णमें आविष्ट होनेके कारण लोक-भयङ्कर
महा-महाविषय भी कोई असुविधा उत्पन्न करनेमें समर्थ
नहीं होते, सभी अवस्थाओंमें ही वे-समभावसे कृष्णसेवक
हैं।" 141 ॥
गोपीनाथको राजाके प्रति अपनी कर्तव्यता और शुक्ल-धन
अर्जन करके व्ययादिके लिये नैतिक धर्मोपदेश :-
किन्तु मोर करिह एक 'आज्ञा'-पालन।
'व्यय ना करिह किछु राजार मूलधन ॥' 142 ॥
राजार मूलधन दिया ये किछु लभ्य हय।
सेइ धन करिह नाना धर्मे-कर्मे व्यय ॥ 143 ॥
असद्व्यय ना करिह,-याते दुइ लोक याय।"
एत बलि' सबाकारे दिलेन विदाय ॥ 144 ॥
अनुवाद-किन्तु तुम लोग मेरी एक आज्ञाका
पालन करना। तुम राजाके मूलधनमें-से कुछ भी व्यय
नहीं करना। राजाको मूलधन देनेके पश्चात् आपको
जो कुछ मिले, उसी धनको ही विभिन्न धर्म-कर्ममें व्यय
करना। धनका असत् व्यय मत करना-इससे यह
लोक और परलोक-दोनों नष्ट हो जाते हैं।" यह
कहकर महाप्रभुने सभीको विदायी दी ॥ 142-144 ॥
अनुभाष्य-अप्राकृत भगवत् दासके अभिमानको
भूलकर सांसारिक-विषय-भोगी बननेपर ही जीव धर्म
और नीतिके विरुद्ध पापोंमें प्रवृत्त होता है; उसीका
निषेध कर रहे हैं। जीवके पापमें प्रवृत्त होनेपर, उसे
लौकिक मङ्गल और अप्राकृत अनुभव-इन दोनों
वस्तुओंको प्राप्त करनेमें ही असुविधा होती है ॥ 142-144 ॥
विषयोंके वर्धित होनेके साथ महाप्रभुकी
अमन्दोदय-दया ही कृपा-विवर्त्त; उसमें
महाप्रभुकी भक्तवश्यताके विषयमें बतलाना :-
रायेर घरे प्रभुर 'कृपा-विवर्त्त' कहिल।
भक्तवात्सल्य-गुण याते व्यक्त हैल ॥ 145 ॥
अनुवाद-इस प्रसङ्गमें श्रीभवानन्द रायके परिवारपर
हुई महाप्रभुकी कृपा-विवर्त्तके विषयमें वर्णन किया गया
है, जिसमें महाप्रभुका भक्त-वात्सल्यरूपी गुण व्यक्त
हुआ है॥ 145 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य - 'कृपा-विवर्त्त', - विषय-मङ्गल
(उन्नति) रूपी कृपा वास्तविक कृपा नहीं है, किन्तु
विषय-बुद्धिसे वह एक वस्तुमें अन्य वस्तुका प्रतीति
रूपी 'विवर्त्त' (भ्रम) प्रतीत हुआ ॥ 145 ॥
नौवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
भक्तोंको महाप्रभुके द्वारा विदायी प्रदान :-
सबाय आलिङ्गिया विदाय यबे दिला।
हरिध्वनि करि' सब भक्त उठि' गेला ॥ 146 ॥
अनुवाद-जब महाप्रभुने उपस्थित अन्य भक्तोंको
आलिङ्गन करके विदायी दी, तब सब भक्त हरिध्वनि
करते हुए उठकर चले गये ॥ 146 ॥