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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 228

[ ४/७२-७५
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७२॥
अमृतप्रवाह भाष्य—आनन्दचिन्मयरसके द्वारा प्रतिभावित जितनी गोपियाँ हैं, उनके साथ
अपने स्वरूपमें अखिलात्माओंके आत्मास्वरूप आदिपुरुष जो श्रीगोविन्द गोलोकमें नित्य निवास
करते हैं, उनका मैं भजन करता हूँ॥७२॥
अनुभाष्य—अखिलात्मभूतः (गोकुलवासिनां प्रियवर्गाणाम् आत्मभूतः) यः एव आनन्दचिन्मयरसप्रतिभाविताभिः
(आनन्दचिन्मयात्मकेन रसेन प्रतिक्षणं भाविताभिः) निजरूपतया (स्व-स्वरूपतया प्रसिद्धाभिः) कलाभिः
(ह्लादिनीशक्तिरूपाभिः) ताभिः (व्रजसुन्दरीभिः सह) गोलोके एव निवसति, तमादिपुरुषं गोविन्दमहं भजामि।
श्लोक-भावानुवाद—जो गोकुलवासी प्रियजनोंके आत्मस्वरूप, आनन्द चिन्मय रससे सर्वदा
भावित निजस्वरूप ह्लादिनीशक्तिरूपा श्रीमती राधा और उनकी कायव्यूह गोपियोंके साथ गोलोक
धाममें निवास करते हैं, उन आदि पुरुष श्रीगोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥७२॥
कृष्णेरे कराय यैछे रस आस्वादन।
क्रीड़ार सहाय यैछे, शुन विवरण॥७३॥
अनुवाद—श्रीमती राधिका श्रीकृष्णको जिस प्रकार रसास्वादन कराती हैं और जिस प्रकार
क्रीड़ा अर्थात् लीलामें सहायता करती हैं, उसे श्रवण करो॥७३॥
ऐश्वर्य और माधुर्यगत मधुर रतिमें तीन प्रकारकी श्रीकृष्णकान्ताएँ :-
कृष्णकान्तागण देखि त्रिविध प्रकार।
एक लक्ष्मीगण, पुरे महिषीगण आर॥७४॥
व्रजाङ्गनारूप आर—कान्तागण-सार।
श्रीराधिका हैते कान्तागणेर विस्तार॥७५॥
अनुवाद—श्रीकृष्णकी प्रेयसियाँ तीन प्रकार की हैं—वैकुण्ठमें लक्ष्मियाँ, द्वारकापुरीमें महिषियाँ
और व्रजमें गोपियाँ। व्रजाङ्गनाएँ इन तीनोंमें श्रेष्ठा हैं। ये सभी प्रेयसियाँ श्रीराधिकाका ही विस्तार
हैं॥७४-७५॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'आर'—अन्य प्रकार, तीसरी प्रकारकी अर्थात् व्रजाङ्गनाएँ, ये सभी
प्रकारकी कान्ताओंकी सार अर्थात् श्रेष्ठा हैं॥७५॥
अमृतानुकणिका—प्रेमके तारतम्यके अनुसार ही कान्ताओंकी श्रेष्ठता कही गयी है। वैकुण्ठमें
नारायणका ऐश्वर्य प्रधान होनेके कारण उनकी प्रेयसी लक्ष्मीका प्रेम ऐश्वर्यज्ञानके कारण शिथिल
है। द्वारकामें माधुर्य ऐश्वर्यसे मिश्रित होनेके कारण महिषियोंके प्रेमका विकास पूर्णतम अवस्था
तक नहीं है। व्रजमें श्रीकृष्णका ऐश्वर्य और माधुर्य पूर्णतम रूपमें अभिव्यक्त होनेपर भी ऐश्वर्य
माधुर्यके द्वारा आच्छादित रहता है, इसलिये व्रजाङ्गनाओंके प्रेमकी अभिव्यक्ति भी वहाँ पूर्णतम
रूपमें है।
'श्रीराधिका हैते कान्तागणेर विस्तार'—नारदपञ्चरात्र (२/३/६०-६५)में इसका प्रमाण देखा
जाता है, नारदजीके प्रति श्रीमहादेवकी उक्ति—
“राधावामांशसम्भूता महालक्ष्मीः प्रकीर्त्तिता।
ऐश्वर्याधिष्ठात्री देवीश्वरस्यैव हि नारद॥
१८६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत