श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2272, कुल 2549 में से
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नौवाँ अध्याय
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महाप्रभुके द्वारा निरपेक्षताका प्रदर्शन और
गोपीनाथका तिरस्कार :-
शुनि' प्रभु कहे किछु करि' प्रणय-रोष।
“राज-कौड़ि दिते नारे, राजार किबा दोष ?? 31 ॥
अनुवाद—सारा वृत्तान्त सुननेके बाद महाप्रभुने
कुछ प्रणय-रोष करते हुए कहा, — “गोपीनाथ राजाका
धन दे नहीं सकता तो इसमें राजाका क्या दोष
है ? 31 ॥
अनुभाष्य—'दिते नारे', —दे नहीं सकता ॥ 31 ॥
राज-विलात् साधि' खाय, नाहि राज-भय।
दारी-नाटुयारे दिया करे नाना व्यय ॥ 32 ॥
अनुवाद—गोपीनाथ लोगोंसे राजकर लेकर उसे
स्वयं उपभोग करता है। राजाका कोई भय नहीं करके
वह वेश्याओं और नर्तकियोंपर धनको लुटाता है ॥ 32 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'राज-विलात्', —बाहरसे राजाको
प्राप्त होनेवाला कर (राजाका भण्डार अथवा सम्पत्ति);
'दारी-नाटुयारे', —वेश्या और नर्तकियोंपर। इन सब
लोगोंको देकर धन व्यय करता है, राजाको भी पैसे
देने पड़ेंगे,—इस प्रकारका भय नहीं करता ॥ 32 ॥
येइ चतुर, सेइ करे राजार विषय।
राज-द्रव्य शोधि' पाय, ताहा करे व्यय ॥” 33 ॥
अनुवाद—जो चतुर है, उसे ही राजकर संग्रह
आदि कार्य करने चाहिये। राजाके धनको उन्हें देनेके
पश्चात् जो कुछ बचता है, उसे उसीको व्यय करना
चाहिये ॥” 33 ॥
उस समय महाप्रभुको श्रीभवानन्दादिके
सपरिवार बन्धनके समाचारकी प्राप्ति :-
हेनकाले आर लोक आइल धाञा।
“वाणीनाथादि सवंशे लञा गेल बान्धिया ॥” 34 ॥
अनुवाद—उसी समय एक और व्यक्ति दौड़कर
आया और महाप्रभुसे कहने लगा,—'राजकर्मचारी वाणीनाथ
आदिको भी परिवारसहित बाँधकर ले गये हैं ॥' 34 ॥
संन्यास धर्मके आदर्शरूपमें महाप्रभुके द्वारा सांसारिक
बातोंमें उदासीनता या निरपेक्षताका प्रदर्शन :-
प्रभु कहे,—“राजा आपने लेखार द्रव्य लइब।
आमि—विरक्त संन्यासी, ताहे कि करिब ?? 35 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “राजाका जो अपना
धन है, उसे वे अपने आप लेंगे। मैं तो विरक्त संन्यासी
हूँ, इसमें मैं क्या कर सकता हूँ?” 35 ॥
अनुभाष्य—'लेखार द्रव्य'—हिसाबका पैसा ॥ 35 ॥
श्रीस्वरूप-दामोदरादि भक्तोंके द्वारा महाप्रभुको उदासीनता
छोड़कर श्रीरामानन्दके स्वजनोंकी रक्षाके लिये प्रार्थना :-
तबे स्वरूपादि गोसाञिर भक्तगण।
प्रभुर चरणे सबे कैला निवेदन ॥ 36 ॥
“रामानन्द-रायेर गोष्ठी, सब—तोमार 'दास'।
तोमार उचित नहे करिते उदास ॥” 37 ॥
अनुवाद—तब श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी आदि
भक्तोंने महाप्रभुके श्रीचरणोंमें निवेदन करते हुए
कहा, — “रामानन्द रायका सम्पूर्ण परिवार ही आपका
दास है, उनके प्रति उदासीन होना आपके लिये उचित
नहीं है ॥” 36-37 ॥
महाप्रभुके द्वारा क्रोध और भर्त्सना :-
शुनि' महाप्रभु कहे सक्रोध वचने।
“मोरे आज्ञा देह' सबे, याङ राजस्थाने ! ! 38 ॥
तोमा सबार एइ मत, —राज-ठाञि याञा।
कौड़ि मागि' लइ आँचल पातिया ॥ 39 ॥
संन्यासीकी विषयी बातोंमें अयोग्यता :-
पाँचगण्डार पात्र हय संन्यासी ब्राह्मण।
मागिले वा केने दिबे दुइलक्ष काहन ? ?' 40 ॥
अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने क्रोधित होकर