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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2270, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2270

[ 9/13–21 नौवाँ अध्याय 253
महाप्रभुकी कृपाके बिना उसकी रक्षा
होनेके कोई उपाय नहीं :—
तले खड्ग पाति’ तारे उपरे डारिबे।
प्रभु रक्षा करेन यबे, तबे निस्तारिबे ॥ 14 ॥
सेवककी रक्षाके लिये महाप्रभुकी कृपाकी याचना :—
सवंशे तोमार सेवक—भवानन्द-राय।
ताँर पुत्र—तोमार सेवके राखिते युयाय ॥” 15 ॥
अनुवाद—एकदिन कुछ लोगोंने आकर महाप्रभुसे
निवेदन किया,—“युवराज ‘बड़ जाना’ने गोपीनाथ पट्टनायकको
चाङ्गपर चढ़ा दिया है और उसने नीचे तलवारोंको
बिछा दिया है। वह गोपीनाथको तलवारोंके ऊपर
फैंकवा देगा। हे महाप्रभु! आप यदि रक्षा करें, तभी
गोपीनाथ बच सकता है। श्रीभवानन्द राय और उनका
पूरा परिवार आपके सेवक हैं। इसलिये आपके लिये
श्रीभवानन्द रायके पुत्रकी रक्षा करना ही उपयुक्त
है॥ 13–15 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘बड़ जाना’,—उड़ीसाके महाराजके
बड़े पुत्र अर्थात् युवराज। ‘चाङ्ग’,—वध करनेकी विशेष
प्रक्रियाके लिये व्यवहार किये जानेवाला मञ्च,—जिसके
नीचेवाले भागमें नंगी तलवारें रखी होती हैं। दण्डित
व्यक्तिको मञ्चके ऊपरसे तलवारोंके ऊपर फेंककर
उसके प्राणोंका नाश किया जाता है ॥ 13 ॥
अनुभाष्य—‘डारिबे’,—फेंक देंगे ॥ 14 ॥
महाप्रभुके प्रश्नके उत्तरमें संवाददाताके द्वारा
गोपीनाथके मृत्यु-दण्डके वृत्तान्तका वर्णन :—
प्रभु कहे,—“राजा केने करये ताड़न?”
तबे सेइ लोक कहे सब विवरण ॥ 16 ॥
“गोपीनाथ-पट्टनायक—रामानन्द-भाइ।
सर्वकाल हय सेइ ‘राजविषयी’ ताइ ॥ 17 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने पूछा,—“राजा गोपीनाथको दण्ड
क्यों दे रहे हैं?” तब वे व्यक्ति सब वृत्तान्त सुनाने
लगे,—“श्रीरामानन्द रायके भाई गोपीनाथ पट्टनायक
सदासे राजाकी सम्पत्तिके रक्षकके रूपमें कार्य करनेवाले
हैं ॥ 16–17 ॥
अनुभाष्य— ‘राजविषयी’,—राजाकी सम्पत्तिके
रक्षक ॥ 17 ॥
‘मालजाठ्या-दण्डपाटे’ तार अधिकार।
साधि’ पाड़ि’ आनि’ द्रव्य दिल राजद्वार ॥ 18 ॥
दुइलक्ष काहन तार ठाञि बाकी हइल।
दुइलक्ष काहन कौड़ि राजा त’ मागिल ॥ 19 ॥
अनुवाद—मालजाठ्या-दण्डपाट नामक स्थानपर उनकी
नियुक्ति हुई है और वे वहींसे राजस्व एकत्रित करके
राजाके कोषमें जमा कराते हैं। उनके द्वारा दो लाख
काहन कौड़ी कोषमें जमा करवाना शेष रह गया है,
इसलिये राजाने उनसे वही दो लाख काहन कौड़ी माँगी
है॥ 18–19 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘मालजाठ्या-दण्डपाट’,—मालजाठ्या
नामक राज्यके खण्डमें तहसीलदार गोपीनाथ पट्टनायकने
जितना पैसा राजाको दिया था, उसमें दो लाख काहन
कौड़ी शेष रह गया था ॥ 19 ॥
तेँह कहे,—‘स्थूलद्रव्य नाहि ये दिब।
क्रमे-क्रमे बेचि’ किनि’ द्रव्य भरिब ॥ 20 ॥
घोड़ा दश-बार हय, लह’ मूल्य करि’।’
एत बलि’ घोड़ा आने राजद्वारे धरि’ ॥ 21 ॥
अनुवाद—गोपीनाथ पट्टनायकने राजासे कहा,—‘मेरे
पास अभी कौड़ीके रूपमें धन नहीं है जो आपको दे
सकूँ। मैं धीरे-धीरे अपनी सम्पत्ति क्रय-विक्रय करके
आपका बचा हुआ धन चुका दूँगा। मेरे पास दस-बारह
घोड़े हैं, आप उनका मूल्य लगाकर उन्हें खरीद
लीजिये।’ यह कहकर गोपीनाथ पट्टनायक घोड़ोंको ले
आये और उन्हें राजद्वारपर बाँध दिया ॥ 20–21 ॥
अनुभाष्य—‘स्थूलद्रव्य’,—मूल्यवान द्रव्य अथवा मोटा