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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2248, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2248

[ 7/145-154 सातवाँ अध्याय 231
श्रीगदाधरके सङ्गसे मधुररसमें भजन करनेकी प्रवृत्ति :-
पण्डितेर सने तार मन फिरि' गेल।
किशोरगोपाल-उपासनाय मन दिल ॥ 145 ॥
अनुवाद—श्रीगदाधर पण्डितके सङ्गसे श्रीवल्लभ
भट्टका मन परिवर्तित हो गया और उन्होंने
अपने मनको किशोरगोपालकी उपासनामें लगा दिया ॥ 145 ॥
श्रीगदाधरसे मन्त्र प्राप्तिकी अभिलाषा,
श्रीगदाधरके द्वारा अस्वीकार करना :-
पण्डितेर ठाञि चाहे मन्त्रादि शिखिते।
पण्डित कहे,—“एइ कर्म नहे आमा हैते ॥ 146 ॥
श्रीगौराङ्ग ही जिनकी एकमात्र गति है,
उन श्रीगदाधरकी श्रीगौर-वश्यता :-
आमि—परतन्त्र, आमार प्रभु—गौरचन्द्र।
ताँर आज्ञा बिना आमि ना हइ 'स्वतन्त्र' ॥ 147 ॥
श्रीवल्लभको मन्त्र-दानके विरुद्धमें युक्ति दिखलाना :-
तुमि ये आमार ठाञि कर आगमन।
ताहातेइ प्रभु मोरे देन ओलाहन ॥”148 ॥
अनुवाद—श्रीवल्लभ भट्ट श्रीगदाधर पण्डितसे
किशोरगोपालकी उपासनाके मन्त्रकी दीक्षा लेना चाहते
थे। किन्तु श्रीगदाधर पण्डितने श्रीवल्लभ भट्टसे कहा,–“यह
कार्य मुझसे नहीं होगा। मैं परतन्त्र हूँ, मेरे प्रभु
श्रीगौरचन्द्र हैं, उनकी आज्ञाके बिना मैं स्वतन्त्र रूपसे
कुछ नहीं कर सकता हूँ। आप जो मेरे पास आते
रहते हो, उसीके लिये महाप्रभु मुझे उलाहना देते
हैं॥”146-148 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘ओलाहन,’—वाक्यदण्ड ॥ 148 ॥
अनुभाष्य—‘मन्त्रादि शिखितेँ,’—दीक्षा ग्रहण करने॥ 146 ॥
श्रीवल्लभको महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्ति :-
एइमत भट्टेर कतेक दिन गेल।
शेषे यदि प्रभु तारे सुप्रसन्न हैल ॥ 149 ॥
भिक्षाके दिन महाप्रभुके कृत्रिम क्रोधसे दुःखी श्रीगदाधरको
महाप्रभुके द्वारा स्नेहसे प्रेमपूर्वक बुलाना :-
निमन्त्रणेर दिने पण्डिते बोलाइला।
स्वरूप, जगदानन्द, गोविन्दे पाठाइला ॥ 150 ॥
अनुवाद—इस प्रकार कुछ दिन व्यतीत होनेपर
जब अन्तमें महाप्रभु श्रीवल्लभ भट्टके प्रति सुप्रसन्न हुए,
तब श्रीवल्लभ भट्टके निमन्त्रणके दिन महाप्रभुने श्रीस्वरूप
दामोदर, श्रीजगदानन्द पण्डित और श्रीगोविन्दको भेजकर
श्रीगदाधर पण्डितको बुलवाया ॥ 149-150 ॥
श्रीपण्डितको श्रीस्वरूपके द्वारा सान्त्वना प्रदान
और सारा वृत्तान्त बतलाना :-
पथे पण्डितेरे स्वरूप कहेन वचन।
“परीक्षिते प्रभु तोमारे कैला उपेक्षण ॥ 151 ॥
श्रीस्वरूपके द्वारा श्रीगदाधरकी प्रतिवाद करनेकी
उत्तेजना-चेष्टाके द्वारा परीक्षा :-
तुमि केने आसि' ताँरे ना दिला ओलाहन?
भीतप्राय हञा केने करिला सहन??”152 ॥
अनुवाद—मार्गमें श्रीस्वरूप दामोदरने श्रीगदाधर पण्डितसे
कहा,–“महाप्रभुने तुम्हारी परीक्षा लेनेके लिये ही
तुम्हारी उपेक्षा की थी। किन्तु तुमने आकर उनकी
बातका प्रतिवाद करते हुए उलाहना क्यों नहीं दिया?
कायर बनकर तुमने उनके अत्याचारको सहन क्यों
कर लिया?”151-152 ॥
महाप्रभुके प्रेममें स्निग्ध श्रीपण्डितकी
ऐश्वर्यज्ञानमयी वश्यता :-
पण्डित कहेन,—“प्रभु सर्वज्ञ-शिरोमणि।
ताँर सने ‘हठ’ करि,—भाल नाहि मानि ॥ 153 ॥
श्रीपण्डितकी अपने प्रियतम महाप्रभुके
सब प्रकारके स्नेहरूपी अत्याचारको
सहन करनेकी स्वाभाविक प्रवृत्ति :-
येइ कहे, सेइ सहि निज-शिर धरिं।
आपने करिबेन कृपा गुण-दोष विचारिं ॥”154 ॥