श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2230, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 7/28-33 सातवाँ अध्याय 213
श्लोकका शब्दार्थ; रासक्रीड़ामें लक्ष्मीका अनधिकार :-
'आत्मभूत'-शब्दे कहे 'पारिषदगण'।
ऐश्वर्यज्ञाने लक्ष्मी ना पाइला व्रजेन्द्रनन्दन ॥ २८ ॥
अनुवाद—'आत्मभूत' शब्दका अर्थ 'पार्षद' है।
ऐश्वर्यज्ञानसे लक्ष्मी पार्षद होनेपर भी व्रजेन्द्रनन्दन
श्रीकृष्णको प्राप्त नहीं कर पायीं॥ २८॥
अनुभाष्य—लक्ष्मी ऐश्वर्यज्ञानमयी होनेपर भी
व्रजेन्द्रकुमारकी सेवाको प्राप्त नहीं कर पायीं। लक्ष्मीदेवी
और आत्मभूत पार्षदोंका श्रीकृष्णके साथ अभिन्न-शक्ति
होनेपर भी, ऐश्वर्यभावसे युक्त लक्ष्मीदेवीको व्रजेन्द्रनन्दनकी
मधुर सेवाधिकारकी प्राप्ति नहीं हुई॥ २८॥
शास्त्र-प्रमाण :-
श्रीमद्भागवत (10/47/60) में—
नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः
स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः।
रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीत कण्ठ-
लब्धाशिषां य उदगाद्व्रजसुन्दरीणाम्॥ २९ ॥
अनुवाद—श्रीवृन्दावनमें रासोत्सवमें श्रीकृष्णकी भुजाओंके
द्वारा आलिङ्गित-कण्ठवाली व्रजसुन्दरियोंके प्रति जो
कृपा उदित हुई थी, वह श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर स्थित
लक्ष्मी आदि परव्योमकी अत्यन्त अनुगत शक्तियोंको
भी प्राप्त नहीं हुई, स्वर्गकी रमणियाँ जिनकी देहसे
कमलकी सुगन्ध आती है, उनको भी उस प्रकारकी
कृपाकी प्राप्ति नहीं हुई, तब अन्य स्त्रियोंके विषयमें तो
क्या कहूँ?॥ २९ ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 8/80 संख्या देखें॥ २९॥
व्रजवासियोंके सख्य और वात्सल्यरसमें केवला या शुद्धा
रागात्मिका भक्ति :-
शुद्धभावे सखा करे स्कन्ध-आरोहण।
शुद्धभावे व्रजेश्वरी करेन बन्धन॥ ३०॥
अनुवाद—शुद्ध अथवा केवला भावसे सखा श्रीकृष्णके
कन्धेपर चढ़ते हैं और व्रजेश्वरी श्रीयशोदा श्रीकृष्णको
बाँधती हैं॥ ३०॥
अनुभाष्य—'शुद्धभावे',—ऐश्वर्यज्ञानसे मुग्ध अथवा
बाध्य नहीं होकर निर्मला अथवा केवला रतिके
वशीभूत होकर॥ ३०॥
'मोर सखा', 'मोर पुत्र',—एइ 'शुद्ध' मन।
अतएव शुक-व्यास करे प्रशंसन॥ ३१॥
अनुवाद—'कृष्ण मेरे सखा हैं', 'कृष्ण मेरे पुत्र
हैं'—यही शुद्ध अर्थात् ऐश्वर्यज्ञानहीन मनका भाव है।
इसलिये श्रीशुकदेव गोस्वामी और श्रीवेदव्यास इन
भक्तोंकी प्रशंसा करते हैं॥ ३१॥
शास्त्र प्रमाण :-
श्रीमद्भागवत (10/12/11) में—
इत्थं सतां ब्रह्मसुखानुभूत्या दास्यं गतानां परदैवतेन।
मायाश्रितानां नरदारकेण सार्द्धं विजह्रुः कृतपुण्यपुञ्जाः॥ ३२॥
अनुवाद—श्रीभागवतमें कहा गया है,—जो ज्ञानमार्गमें
ब्रह्मसुखानुभूति स्वरूपमें, दास्यरसके भक्तोंको परदेवतारूपमें
एवं मायाश्रित व्यक्तियोंको नरबालकके रूपमें प्रतीत होते
हैं, उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णके साथ व्रजके गोपबालकोंने
बहुत सुकृतिके फलस्वरूप सख्यरसमें विहार किया
था॥ ३२॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 8/75 संख्या देखें॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत (10/8/45) में—
त्रय्या चोपनिषद्भिश्च सांख्ययोगैश्च सात्वतैः।
उपगीयमानमाहात्म्यं हरिं साऽमन्यतात्मजम्॥ ३३॥
अनुवाद—तीनों वेदों, उपनिषद्-समूह, सांख्ययोग
और भक्तिशास्त्रोंके द्वारा जिनके माहात्म्यका गान किया
जाता है, उन श्रीकृष्णको यशोदा अपना 'पुत्र' समझती
हैं॥ ३३॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 19/204 संख्या देखें॥ ३३॥