श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें204 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/309–313 ]
रेखा,’—श्रील रघुनाथके वैराग्यकी विधि पत्थरके ऊपर
रेखाकी भाँति अत्यन्त दृढ़ थी॥ 309 ॥
प्रतिक्षण कृष्णभजन :—
साड़े सात प्रहर याय कीर्त्तन–स्मरणे।
सबे चारि–दण्ड आहार–निद्रा कोन दिने॥ 310 ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथ दासके साढ़े सात प्रहर (साढ़े
बाइस घण्टे) कीर्तन और स्मरणमें ही व्यतीत होते।
किसी दिनमें कुल चार दण्डमें (डेढ़ घण्टेमें) ही उनके
आहार और निद्रा होते॥ 310 ॥
अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—
“सार्द्धसप्तप्रहर याय स्मरण–कीर्त्तने।
आहार–निद्रा–चारि दण्ड, सेह नहे कोन दिने॥”
[अर्थात् “साढ़े सात प्रहर उनके स्मरण-कीर्तनमें
जाते। आहार-निद्राके लिये उन्हें केवल चार दण्डका
(डेढ़ घण्टेका) समय मिलता और कभी वह भी नहीं
मिलता॥”]॥ 310 ॥
छहों वेगोंको विजय करनेवाले गोस्वामी श्रीरघुनाथ :—
वैराग्येर कथा ताँर अद्भुत–कथन।
आजन्म ना दिला जिह्वाय रसेर स्पर्शन॥ 311 ॥
छिण्डा–कानि काँथा बिना ना परे वसन।
सावधाने प्रभुर कैला आज्ञार पालन॥ 312 ॥
जिससे शरीरका निर्वाह हो, उतना ही स्वीकार करना :—
प्राण–रक्षा लागि’ येबा करेन भक्षण।
ताहा खाञा आपनाके करे निर्वेदन॥ 313 ॥
अनुवाद—उनके वैराग्यकी बात तो अद्भुत कथा
है। उन्होंने सम्पूर्ण जीवन अपनी जिह्वाको जड़ रसका
स्पर्श तक नहीं होने दिया। उन्होंने चिथड़े वस्त्रोंके
अतिरिक्त अन्य कोई भी वस्त्र नहीं पहना। उन्होंने बड़ी
कठोरतासे महाप्रभुकी आज्ञाका पालन किया। वे अपने
प्राणोंकी रक्षाके लिये थोड़ासा कुछ खाते थे। उसे
खाकर उसके लिये भी स्वयंको धिक्कार देते॥ 311–313 ॥
अनुभाष्य—'निर्वेदन',—भर्त्सना, धिक्कार॥ 313 ॥
अमृतानुकणिका—श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी प्रभुमें
वैराग्य, ऐश्वर्य, ज्ञान, वीर्य, यश, श्री—सभी स्वाभाविक
रूपसे रहकर धन्य हुए थे, किन्तु उन्होंने इनके लिये
कोई भी प्रयत्न नहीं किया। समस्त ऐश्वर्य, विभुता,
सिद्धि उनके हाथोंमें थी, किन्तु वे कर्मी–ज्ञानी–
योगी–तपस्वीके समान ऐश्वर्यके भिखारी या ऐश्वर्य–प्रदर्शनके
लोभी नहीं थे। कर्मी–ज्ञानी–योगी–तपस्वी कभी भी जिस
ऐश्वर्यके बिन्दु–मात्रको भी नहीं प्राप्त कर सकते, उस
प्रकारके अनन्त निखिल ऐश्वर्यके श्रील रघुनाथदास
गोस्वामी प्रभुके चरण–नखमें विराजित रहकर धन्य
होनेपर भी श्रील रघुनाथदास उन सब ऐश्वर्यके व्यापारी
नहीं थे। फल्गु मायावादियोंके जैसे उनकी वैराग्य–चेष्टा
भी नहीं थी। वे कर्मियों–ज्ञानियों–योगियोंके जैसे वैराग्यके
भिखारी भी नहीं थे। वैराग्य–सिद्धिकी सीमा उनको
प्राप्त करके धन्य हुई थी।
श्रील रघुनाथदासने इस प्रकारके वैराग्यादिके लिये
यत्न क्यों नहीं किया? जीव अपने प्रेयः के लिये
व्यस्त रहता है। प्रेयः बुरी वस्तु नहीं है यदि वह
श्रीकृष्णको केन्द्रीभूत करके हो। श्रीकृष्णको जो अपने
अपेक्षा सौ गुणा अधिक प्रेम करते हैं और श्रीकृष्णके
प्रियजनको हजार गुणा प्रेम करते हैं, उनका विचार इस
प्रकार होता है (विलापकुसुमाञ्जली 102)—
“आशाभरैरमृतसिन्धुमयैः कथञ्चित्
कालो मयातिगमितः किल साम्प्रतं हि।
त्वञ्चत् कृपां मयि विधास्यसि नैव किं मे
प्राणैर्व्रजेन च वरोरु बकारिणापि॥
“हे वरोरु राधे! मैं अमृतसिन्धुकी प्राप्तिकी प्रचुर
आशामें अभी अति कष्टसे काल व्यतीत कर रहा हूँ,
अभी यदि आप मेरे प्रति कृपा विधान नहीं करेंगी, तो
मेरे प्राण, व्रजवास, यहाँ तक कि मुझे कृष्णसे क्या
प्रयोजन है?”
इस प्रकार वैराग्य–सिद्धिकी पराकाष्ठाकी बात क्या
कभी किसीने सुनी है? श्रील रघुनाथदास गोस्वामी