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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2214, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2214

[ 6/263-270 छठा अध्याय 197
रघुनाथः (श्रीदासगोस्वामी) नीलाचले (पुरुषोत्तमक्षेत्रे) तिष्ठतां
(निवसतां मध्ये) कस्य न विदितः ? [सर्वेषामेव परिचितोऽस्तीति
भावः] ।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 263 ॥
श्रीरघुनाथका अतुलनीय सौभाग्य :-
यः सर्वलोकैकमनोभिरुच्या
सौभाग्यभूः काचिदकृष्टपच्या।
यस्यां समारोपणतुल्यकालं
तत्प्रेमशाखी फलवानतुल्यः ॥ 264 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 264 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-जो समस्त लोगोंकी मनोभिरुचिके
(चित्तरञ्जनके) द्वारा कोई एक (अनिर्वचनीय) अकृष्टपच्या
(स्वतःप्रकटित) सौभाग्यकी भूमि (आधार-स्वरूपा) बने
थे, जिनमें बीज बोनेके समय ही (श्रीचैतन्यका) अतुल्य
(अनुपम) प्रेम-शाखी (वृक्ष) फलवान् हुआ था ॥ 264 ॥
अनुभाष्य-
यः (दासगोस्वामी) सर्वलोकैकमनोभिरुच्या (सर्वेषां भक्तानां
लोकानाम् एका प्रधाना या मनसः अभिरुचिः प्रीतिः तया)
काचित् (अनिर्वचनीया) अकृष्टपच्या (कर्षणव्यतिरेकेण पक्वा,
अर्थात् साधनेन सिद्धिलाभात् पूर्वमेव साधनव्यतिरेकेण वा
सिद्धा) सौभाग्यभूः (सौभाग्यभूमिः), यस्यां (भूमौ) समारोपण-
तुल्यकालं (बीजवपनसमकालमेव) अतुल्यः (अनुपमः) तत्प्रेमशाखी
(तत् तस्य श्रीचैतन्यस्य प्रेमा, स एव शाखी वृक्षः) फलवान्
[अभवत् इति शेषः] ।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 264 ॥
शिवानन्द यैछे सेइ मनुष्ये कहिला।
कर्णपूर सेइरूपे श्लोक वर्णिला ॥ 265 ॥
अनुवाद-श्रीशिवानन्द सेनने श्रीरघुनाथ दासके विषयमें
जैसा उनके पिताके द्वारा भेजे गये व्यक्तिसे कहा,
श्रीकविकर्णपूरने उपरोक्त श्लोकोंमें उसी बातका ही
वर्णन किया है ॥ 265 ॥
गोवर्धनके द्वारा भेजे गये धन, सेवक और ब्राह्मणका
वर्षाकालमें श्रीशिवानन्दके साथ पुरीमें जाना :-
वर्षान्तरे शिवानन्द चले नीलाचले।
रघुनाथेर सेवक, विप्र ताँर सङ्गे चले ॥ 266 ॥
अनुवाद-अगले वर्ष जब श्रीशिवानन्द सेन नीलाचलके
लिये चले, तब श्रीरघुनाथ दासके पिताके द्वारा भेजे गये
सेवक और एक ब्राह्मण भी श्रीशिवानन्द सेनके साथ
चल दिये ॥ 266 ॥
सेइ विप्र-भृत्य, चारि-शत मुद्रा लञा।
नीलाचले रघुनाथे मिलिला आसिया ॥ 267 ॥
अनुवाद-वह ब्राह्मण और सेवक चार सौ मुद्राएँ
लेकर श्रीजगन्नाथ पुरीमें आये थे और वहाँ वे श्रीरघुनाथ
दाससे मिले ॥ 267 ॥
श्रीरघुनाथके द्वारा उन सबको अस्वीकार करना :-
रघुनाथ-दास अङ्गीकार ना करिल।
द्रव्य लञा दुइजन ताँहाइ रहिल ॥ 268 ॥
अनुवाद-श्रीरघुनाथ दासने उस धन और उन
सेवकों एवं ब्राह्मणको स्वीकार नहीं किया। तब एक
सेवक और ब्राह्मण, ये दो व्यक्ति उन मुद्राओंको लेकर
वहींपर रह गये ॥ 268 ॥
प्रतिमास श्रीरघुनाथका महाप्रभुको दो बार निमन्त्रण :-
तबे रघुनाथ करि' अनेक यतन।
मासे दुइदिन कैला प्रभुर निमन्त्रण ॥ 269 ॥
अनुवाद-तब श्रीरघुनाथने यत्नपूर्वक बड़े सम्मानके
साथ महाप्रभुको एक मासमें दो दिन भोजनके लिये
निमन्त्रण करना प्रारम्भ किया ॥ 269 ॥
उसके लिये ही श्रीरघुनाथके द्वारा गोवर्धनके
द्वारा भेजे धनको लेना :-
दुइ निमन्त्रणे लागे कौड़ि अष्टपण।
ब्राह्मण-भृत्य-ठाञि करेन एतेक ग्रहण ॥ 270 ॥
अनुवाद-दो बार निमन्त्रणमें आठ आने खर्च होते