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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2210

[ 6/228–238 छठा अध्याय 193
है? कृपया इस विषयमें मुझे उपदेश प्रदान करें?" 228-229 ॥
स्वयं मौन रहकर श्रीरघुनाथके द्वारा श्रीस्वरूप और
श्रीगोविन्दके द्वारा महाप्रभुके साथ वार्तालाप :-
प्रभुर आगे कथामात्र ना कहे रघुनाथ।
स्वरूप-गोविन्दद्वारा कहाय निज-बात्॥ 230 ॥
अनुवाद-श्रीरघुनाथ दास महाप्रभुके आगे कोई भी
बात नहीं करते थे। वे श्रीस्वरूप दामोदर और
श्रीगोविन्दके द्वारा ही महाप्रभुसे अपने हृदयकी बात
कहलवाते थे॥ 230 ॥
एकदिन श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुसे
श्रीरघुनाथके कर्त्तव्यकी जिज्ञासा :-
प्रभुर आगे स्वरूप निवेदिला आर दिने।
“रघुनाथ निवेदय प्रभुर चरणे ॥ 231 ॥
कि मोर कर्त्तव्य, मुञि ना जानि उद्देश।
आपनि श्रीमुखे मोरे करुन उपदेश ॥" 232 ॥
अनुवाद-अगले दिन श्रीस्वरूप दामोदरने महाप्रभुसे
निवेदन करते हुए कहा, - “रघुनाथ आपके चरणकमलोंमें
निवेदन कर रहा है 'मेरा क्या कर्त्तव्य है, मेरे जीवनका
क्या उद्देश्य है, मैं इस विषयमें कुछ नहीं जानता।
इसलिये आप (महाप्रभु) स्वयं मुझे अपने श्रीमुखसे इस
विषयमें उपदेश प्रदान करें।'” 231-232 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीरघुनाथको श्रीस्वरूपको अपने
शिक्षागुरुके रूपमें वरण करनेका आदेश :-
हासि' महाप्रभु रघुनाथेरे कहिल।
“तोमार उपदेष्टा करि' स्वरूपेरे दिल ॥ 233 ॥
माध्व-गौड़ीयोंके नित्यप्रभु या गुरु श्रीदामोदरस्वरूप ही
समस्त साध्य-साधन-तत्त्वके आचार्य :-
'साध्य'-'साधन'-तत्त्व शिख इँहार स्थाने।
आमि यत नाहि जानि, इँहो तत जाने ॥ 234 ॥
अनुवाद-महाप्रभुने मुस्कुराते हुए श्रीरघुनाथ दाससे
कहा, - “मैंने स्वरूप दामोदरको तुम्हारा उपदेष्टा नियुक्त
किया है। तुम इन्हींसे ही साध्य तथा साधन तत्त्वको
सीखो। मैं स्वयं उतना नहीं जानता हूँ, जितना ये
जानते हैं॥ 233-234 ॥
तथापि आमार आज्ञाय यदि श्रद्धा हय।
आमार एइ वाक्ये तुमि करिह निश्चय ॥ 235 ॥
महाप्रभुके द्वारा रागानुगा-भक्तके आचारका वर्णन :-
ग्राम्यकथा ना शुनिबे, ग्राम्यवार्त्ता ना कहिबे।
भाल ना खाइबे, आर भाल ना परिबे ॥ 236 ॥
अमानी मानद हञा कृष्णनाम सदा लबे।
व्रजे राधाकृष्ण-सेवा मानसे करिबे ॥ 237 ॥
अनुवाद-तथापि यदि तुम्हारी मेरी आज्ञाके प्रति
श्रद्धा है तो तुम मेरे इन वचनोंको अवश्य ही पालन
करना। तुम कभी भी सांसारिक बातें मत सुनना और
न ही सांसारिक बातें कहना। अच्छा (स्वादिष्ट वस्तुएँ)
मत खाना तथा न ही अच्छा (सुन्दर वस्त्र) पहनना।
तुम दूसरेसे सम्मानकी आशा मत रखना और सबको
यथायोग्य सम्मान देते हुए सदा कृष्णनामका उच्चारण
करना एवं मनके द्वारा व्रजमें राधाकृष्णकी सेवा
करना॥ 235-237 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-स्त्री और पुरुष विवाहित होकर
सन्तानादि उत्पन्न करके जिस संसारकी नींव डालते हैं,
उस संसारके सम्बन्धमें जितनी बातें हैं, वे सब कुछ
'ग्राम्य' कथा-वार्त्ता है; वह कभी भी वैरागी अथवा
वैष्णवोंके लिये सुनने अथवा बोलने योग्य नहीं है।
अच्छा खाना, अच्छा पहनना, - यह भी वैरागीके लिये
उचित नहीं है; अन्योंके प्रति सम्मान और स्वयं
अमानी होकर सदैव कृष्णनाम करना एवं मनसे व्रजमें
श्रीराधाकृष्णकी सेवा करना, - यही वैरागीका कर्त्तव्य
है॥ 237 ॥
एइ त' संक्षेपे आमि कैलुँ उपदेश।
स्वरूपेर ठाञि इहार पाबे सविशेष ॥ 238 ॥
अनुवाद-मैंने संक्षेपमें तुम्हें यह उपदेश प्रदान