श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें188 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/193-198 ]
लोगोंको शिक्षा देनेके लिये ही श्रीरघुनाथदासको उपलक्ष्य
करके ऐसा कहा ॥ 193 ॥
श्रीरघुनाथकी एकान्तिकी श्रीगौरकृष्णनिष्ठा :-
रघुनाथ कहे मने, — ‘कृष्ण नाहि जानि।
तव कृपा काड़िल आमा,—एइ आमि मानि॥’ 194 ॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथने मन-ही-मन कहा, —“मैं
श्रीकृष्णको नहीं जानता हूँ। मैं तो यही मानता हूँ कि
आपकी कृपाने ही मेरा उद्धार किया है॥” 194 ॥
महाप्रभुके द्वारा हिरण्य और गोवर्धनका चरित्र-वर्णन :-
प्रभु कहेन,—“तोमार पिता-ज्येठा दुइ जने।
चक्रवर्त्ती-सम्बन्धे आमि 'आजा' करि' माने ॥ 195 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“मैं तुम्हारे पिता और
ताऊको श्रीनीलाम्बर चक्रवर्त्तीके सम्बन्धसे अपना 'नाना'
ही मानता हूँ॥ 195 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-नीलाम्बर चक्रवर्त्तीके सम्बन्धसे
मैं उन्हें 'आजा' अर्थात् नाना मानता हूँ॥ 195 ॥
अनुभाष्य-श्रीनीलाम्बर चक्रवर्त्ती रघुनाथके पिता
और उनके बड़े भाईको अपनेसे आयुमें छोटा सम्भ्रान्त
कायस्थ जानकर 'भाई' कहकर पुकारते थे और दोनों
भाई भी श्रीनीलाम्बरको आयुमें बड़े ब्राह्मण जानकर
'बड़े भाई' कहकर सम्बोधित करते थे, श्रीमन्महाप्रभु
नानाके भाई होनेके सम्बन्धसे उन्हें भी अपने 'रहस्य
अर्थात् परिहासका पात्र' समझते थे। इस सम्बोधनसे
अनेक लोगोंको ऐसा भ्रम हो सकता है कि श्रीरघुनाथ
महाप्रभुकी अपेक्षा आयुमें बहुत बड़े थे, किन्तु वास्तवमें
ऐसा नहीं है ॥ 195 ॥
चक्रवर्त्तीर दुँहे हय भ्रातृरूप दास।
अतएव तारे आमि करि परिहास ॥ 196 ॥
अनुवाद-तुम्हारे पिता और ताऊ-दोनों श्रीनीलाम्बर
चक्रवर्त्तीके छोटे भाईरूपी दास हैं। इसलिये मैं उनके
विषयमें परिहास कर रहा हूँ॥ 196 ॥
विषयरूपी विषका सेवन-आत्मसंहारक अर्थात् जीवके
स्वरूप अथवा चिद्बल-प्राप्तिका भीषण विघ्नस्वरूप :-
तोमार बाप-ज्येठा-विषयविष्ठा-गर्त्तेर कीड़ा।
सुख करि' माने विषय-विषेर महापीड़ा ॥ 197 ॥
अनुवाद-तुम्हारे पिता और ताऊ-दोनों विषयरूपी
मलके गड्ढेके कीड़े हैं। वे विषयरूपी विषकी महापीड़ाको
भी सुख मानते हैं॥ 197 ॥
अनुभाष्य- 'विषय' अपने भोक्ता विषयीको महाक्लेश
प्रदान करता है, तथापि विषयोंमें आविष्ट चित्तवाले
सांसारिक लोग उन महाक्लेश प्रदान करनेवाले विषयोंको
सुख मानते हैं। जड़ेन्द्रियोंके भोगके विषय-त्याग-योग्य
मलके गड्ढेके समान है। विषयोंमें अभिनिविष्ट जीव-घृणित
मलके कीटके समान है अर्थात् पारमार्थिक दृष्टिमें
जड़भोक्ता प्राकृत विषयी - मलके गड्ढेके कीड़ेके समान
है एवं उस कीड़ेके रूपमें महानन्दसे नितान्त-घृणित
विषयरूपी मलके आस्वादनमें प्रमत्त है ॥ 197 ॥
भोक्ताके अभिमानमें अथवा देहात्मबुद्धिके कारण
अन्याभिलाष, कर्म और ज्ञान-मिश्र, होनेपर भी अप्रतिकूल
विष्णु-वैष्णवोंके आनुगत्यका आभास अथवा लौकिकी
श्रद्धा शुद्धभक्ति नहीं, कनिष्ठ-अधिकार मात्र :-
यद्यपि ब्रह्मण्य करे ब्राह्मणेर सहाय।
'शुद्धवैष्णव' नहे, 'वैष्णवेर प्राय' ॥ 198 ॥
अनुवाद-यद्यपि तुम्हारे पिता और ताऊ-दोनों
ब्राह्मणोंकी सहायता करते हैं, तथापि वे 'शुद्धवैष्णव'
नहीं, अपितु 'वैष्णव-प्राय' हैं ॥ 198 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-वैष्णवोंकी भाँति वेशभूषा और
देवसेवा आदिके रहनेपर भी शुद्ध वैष्णव नहीं हो
सकते, क्योंकि जब तक 'अन्याभिलाषिता-शून्य' आदि
शुद्धभक्तिके लक्षण नहीं हों, तब तक दीक्षादि प्राप्त
होनेपर भी 'वैष्णवप्राय' ही रहते हैं ॥ 198 ॥
अनुभाष्य-हिरण्य और गोवर्धन-दोनों भाई ही
ब्राह्मणोंका सम्मान करनेवाले, उनके पालक, पोषक