श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें182 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/138-152 ]
करनेके लिये आये थे, अब समझ लो कि तुम्हारी जो
भी विघ्न-बाधाएँ थीं, वे सब दूर हो गयी हैं। महाप्रभु
तुम्हें स्वरूप दामोदरको समर्पित कर देंगे और तुम्हें
अपना अन्तरङ्ग सेवक कहकर अपने चरणकमलोंमें
स्थान देंगे। तुम निश्चिन्त होकर अपने घर लौट
जाओ। अतिशीघ्र निर्विघ्न ही तुम्हें श्रीचैतन्य महाप्रभुके
चरणकमलोंके आश्रयकी प्राप्ति होगी॥” 138-143॥
भक्तोंके द्वारा श्रीरघुनाथको आशीर्वाद दिलवाना;
श्रीरघुनाथके द्वारा भक्तोंके चरणोंकी वन्दना :—
सब भक्तद्वारे ताँरे आशीर्वाद कराइला।
ताँ-सबार चरण रघुनाथ वन्दिला॥ 144॥
अनुवाद—श्रीनित्यानन्द प्रभुने समस्त भक्तोंके द्वारा
श्रीरघुनाथदासको आशीर्वाद दिलवाया और श्रीरघुनाथदासने
भी समस्त भक्तोंके चरणोंकी वन्दना की॥ 144॥
श्रीराघवके साथ गुप्त स्थानपर परामर्श :—
प्रभु-आज्ञा लञा वैष्णवेर आज्ञा लइला।
राघव-सहिते निभृते युक्ति करिला॥ 145॥
अनुवाद—श्रीरघुनाथदासने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे आज्ञा
लेनेके पश्चात् उपस्थित समस्त वैष्णवोंसे आज्ञा ली
तथा उन्होंने श्रीराघव पण्डितके साथ एकान्तमें कुछ
परामर्श किया॥ 145॥
प्रभुके भण्डारीके हाथमें प्रणामीके रूपमें धन-प्रदान :—
युक्ति करि' शत मुद्रा, सोणा तोला-साते।
निभृते दिला प्रभुर भाण्डारीर हाते॥ 146॥
इस बातको प्रभुके निकट गुप्त रखनेका अनुरोध :—
ताँरे निषेधिला,—“प्रभुरे एबे ना कहिबा।
निज-घरे याबेन यबे, तबे निवेदिबा॥” 147॥
अनुवाद—श्रीराघव पण्डितसे परामर्श करनेके उपरान्त
श्रीरघुनाथने श्रीनित्यानन्द प्रभुके भण्डारीको एकान्तमें
एक सौ स्वर्णकी मुद्राएँ तथा सात तोला सोना दिया
और उनसे कहा,—“आप अभी यह बात श्रीनित्यानन्द
प्रभुको मत बतलाना। जब वे अपने वासस्थानपर पहुँच
जायेंगे, तभी उन्हें इस विषयमें बतलाना॥” 146-147॥
श्रीराघवके द्वारा श्रीरघुनाथको अपने गृहमें स्थापित विग्रहोंके
दर्शन कराके यथोचित सम्मान प्रदान :—
तबे राघव पण्डित ताँरे घरे लञा गेला।
ठाकुर दर्शन कराञा माला-चन्दन दिला॥ 148॥
वैष्णव-चरण-पूजाके योग्य आदर्शको दिखलाकर
श्रीरघुनाथके द्वारा धनी विषयी लोगोंको शिक्षा-प्रदान :—
अनेक 'प्रसाद' दिला पथे खाइबारे।
तबे पुनः रघुनाथ कहे पण्डितेरे॥ 149॥
“प्रभुर सङ्गे यत महान्त, भृत्य, आश्रित जन।
पूजिते चाहिये आमि सबार चरण॥ 150॥
बिश, पञ्चाश, दश, बार, पञ्चदश, द्वय।
मुद्रा देह' विचारिया योग्य यत हय॥” 151॥
अनुवाद—तब श्रीराघव पण्डित श्रीरघुनाथदासको
अपने घरमें ले गये और उन्हें अपने घरमें सेवित
श्रीठाकुरजीके दर्शन करवाकर माला और चन्दन प्रदान
किया। उन्होंने श्रीरघुनाथदासको मार्गमें खानेके लिये
बहुत प्रसाद दिया। तब श्रीरघुनाथदासने पुनः श्रीराघव
पण्डितसे कहा,—“श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ जितने भी
महान् भक्त, उनके सेवक और आश्रित जन हैं, मैं उन
सबके भी चरणोंकी पूजा करना चाहता हूँ। आप
विचार करके उन सबके अधिकारके अनुसार बीस,
पन्द्रह, बारह, दस अथवा पाँच—जितनी मुद्राएँ उचित
समझें, वे उन्हें दे दीजिये॥” 148-151॥
सभीको अभिनन्दन पत्र और प्रणामी-प्रदान :—
सब लेखा करिया राघव-पाश दिला।
याँर नामे यत राघव चिठि लेखाइला॥ 152॥
अनुवाद—तब श्रीरघुनाथदासने कुल प्रणामीका
लेखा-जोखा करके श्रीराघव पण्डितको प्रदान किया
और उसके अनुसार श्रीराघव पण्डितने किस भक्तको