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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2191, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2191

174 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 6/66-76 ]
अनुवाद-चबूतरेके चारों ओर भूमिपर मण्डली
बनाकर जितने लोग बैठे थे, उनकी भी गणना नहीं
की जा सकती॥ 66 ॥
एकेक जनारे दुइ दुइ होल्ना दिल।
दधि-चिड़ा, दुग्ध-चिड़ा, दुइते भिजाइल॥ 67 ॥
अनुवाद-प्रत्येक व्यक्तिको दो-दो मिट्टीके पात्र दिये
गये। उनमेंसे एकमें दहीमें भिगोया चिड़वा और दूसरेमें
घने दूधमें भिगोया चिड़वा था॥ 67 ॥
कोन कोन विप्र उपरे स्थान ना पाञा।
दुइ होल्नाय चिड़ा भिजाय गङ्गातीरे गिया॥ 68 ॥
अनुवाद-कुछ-कुछ ब्राह्मण चबूतरेके ऊपर स्थान
नहीं मिलनेपर दोनों मिट्टीके पात्रोंको लेकर गङ्गाके
तटपर चले गये और वहीं चिड़वेको भिगोने लगे॥ 68 ॥
तीरे स्थान ना पाञा आर कत जन।
जले नामि' दधि-चिड़ा करये भक्षण॥ 69 ॥
अनुवाद-और कितने ही लोगोंको गङ्गाके तटपर
भी स्थान नहीं मिला, इसलिये वे गङ्गाके जलमें खड़े
होकर दही-चिड़वा आदि खाने लगे॥ 69 ॥
केह उपरे, केह तले, केह गङ्गातीरे।
बिशजन तिन-ठाञि परिवेषन करे॥ 70 ॥
अनुवाद-कोई चबूतरेके ऊपर, कोई चबूतरेके
नीचे भूमिपर, कोई गङ्गाके तटपर बैठा हुआ था। तीनों
स्थानोंपर बैठे इन सभी व्यक्तियोंको बीस जन भोजन
परिवेषण करने (परोसने) लगे॥ 70 ॥
प्रसादके साथ श्रीराघव-पण्डितका वहाँ आगमन :-
हेनकाले आइला तथा राघव पण्डित।
हासिते लागिला देखि' हञा विस्मित॥ 71 ॥
अनुवाद-उसी समय श्रीराघव पण्डित वहाँपर आ
गये। उस महोत्सवको देखकर वे आश्चर्यचकित होकर
हँसने लगे॥ 71 ॥
सर्वप्रथम श्रीनित्यानन्दको, बादमें भक्तोंको प्रसाद-प्रदान :-
नि-सकड़ि नानामत प्रसाद आनिला।
प्रभुरे आगे दिया भक्तगणे बाँटि दिला॥ 72 ॥
अनुवाद-श्रीराघव पण्डित अनेक प्रकारका नि-सकड़ि
प्रसाद लेकर आये। उन्होंने पहले एक भाग श्रीनित्यानन्दके
आगे रखा और बचा हुआ अन्य भक्तोंमें बाँट
दिया॥ 72 ॥
अनुभाष्य-'नि-सकड़ि', -जो सकड़ि (अन्नके स्पर्शसे
अपवित्र) नहीं है॥ 72 ॥
भोजन करनेके लिये श्रीनित्यानन्द प्रभुसे अनुरोध :-
प्रभुरे कहे, - "तोमा लागि' भोग लागाइल।
तुमि इँहा उत्सव कर, घरे प्रसाद रहिल॥" 73 ॥
अनुवाद-श्रीराघव पण्डितने श्रीनित्यानन्द प्रभुसे
कहा, - "मैंने आपके लिये घरमें भोग लगाया है और
आप यहाँपर उत्सव कर रहे हैं। आपके लिये घरमें
प्रसाद रखा हुआ है॥" 73 ॥
श्रीनित्यानन्द प्रभुको गोपाभिमानमें व्रजलीलाका उद्दीपन :-
प्रभु कहे, - "ए द्रव्य दिने करिये भोजन।
रात्र्ये तोमार घरे प्रसाद करिमु भक्षण॥ 74 ॥
सखाओंके साथ यमुना तटपर पुलिन-भोजन-आनन्द :-
गोप-जाति आमि बहु गोपगण-सङ्गे।
आमि सुख पाइ एइ पुलिनभोजन-रङ्गे॥" 75 ॥
अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुने कहा, - "मुझे अभी
दिनमें यह सब खाने दो, रात्रिके समय तुम्हारे घरपर
प्रसाद ग्रहण करूँगा। मैं गोप-जातिका हूँ तथा मेरे साथ
बहुतसे गोप हैं। मुझे इन सबके साथ नदीके तटपर
पुलिन भोजन करनेमें बहुत आनन्द होता है॥" 74-75 ॥
श्रीराघवका भी वहाँ भोजन करना :-
राघवे बसाइा दुइ कुण्डी देओयाइला।
राघव द्विविध चिड़ा ताते भिजाइला॥ 76 ॥
अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीराघव पण्डितको