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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

४/५५-५७ ]
आदि चौदह श्लोकोंमें पाँचवें श्लोककी व्याख्या :-
श्रीस्वरूपगोस्वामि-कड़चासे-
राधा कृष्णप्रणयविकृतिर्ह्लादिनीशक्तिरस्मा-
देकात्मानावपि भुवि पुरा देहभेदं गतौ तौ।
चैतन्याख्यं प्रकटमधुना तद्द्वयञ्चैक्यमाप्तं
राधाभावद्युतिसुवलितं नौमि कृष्णस्वरूपम् ॥५५॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५५॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीराधा श्रीकृष्णकी प्रणय-विकृतिरूप ह्लादिनीशक्तिके प्रभावसे श्रीराधाकृष्ण
स्वरूपतः एकात्मक होनेपर भी विलासतत्त्वकी नित्यताके कारण श्रीराधा-कृष्ण नित्यरूपसे दो
स्वरूपोंमें विराजमान हैं। वही दो तत्त्व अब एक स्वरूपमें चैतन्य-तत्त्वरूपमें प्रकट हुए हैं।
इसलिये श्रीराधाकी भाव और कान्तिके द्वारा सुवलित उन्हीं श्रीकृष्णस्वरूप गौरसुन्दरको मैं
प्रणाम करता हूँ॥५५॥
अनुभाष्य-राधा कृष्णप्रणयविकृतिः (कृष्णस्य प्रणयविकृतिः प्रेमविलासरूपा ह्लादिनी शक्तिः); एकात्मानौ
(अभित्रात्मानौ) अपि पुरा (अनादिकालत:) तौ (राधाकृष्णौ) भुवि देहभेदं (विषयाश्रयगत-विग्रहद्वयभेदं) गतौ
(प्राप्तौ)। अधुना (इदानीं) तद्द्वयं (तयोर्द्वयं) ऐक्यम् आप्तम्; राधाभावद्युतिसुवलितं (भावश्च द्युतिश्च भावद्युती,
राधायाः भावद्युती, ताभ्यां सुवलितं युक्तम्, अन्तःकृष्णं बहिर्गौरं) चैतन्याख्यां प्रकटं (प्रकटितविग्रहं) कृष्णस्वरूपं
नौमि (प्रणमामि)।
श्लोक-भावानुवाद-राधा कृष्णके प्रणयकी विकार अर्थात् प्रेमविलासरूपा ह्लादिनी शक्तिके
प्रभावसे श्रीराधाकृष्ण अभिन्न आत्मा होते हुए भी अनादिकालसे विषय और आश्रय-इन दो
विग्रहोंके भेदको प्राप्त हुए थे। अब वे दोनों एक रूप हुए हैं। राधाजीके भाव और द्युति,
इन दोनोंसे युक्त, अन्दर श्रीकृष्ण और बाहर श्रीगौरसुन्दर, श्रीकृष्णस्वरूप उन श्रीचैतन्य नामसे
प्रकटित विग्रहको मैं प्रणाम करता हूँ॥५५॥
पहले श्रीराधा-कृष्णतत्त्व :-
राधाकृष्ण एक आत्मा, दुइ देह धरि'।
अन्योन्ये विलासे रस आस्वादन करि' ॥ ५६ ॥
अनुवाद-श्रीराधाकृष्ण एक आत्मा होनेपर भी दो शरीर धारण करके परस्पर विभिन्न
प्रकारके विलासमैं रसास्वादन करते हैं॥५६॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'अन्योन्ये' - अर्थात् परस्परमें। इस पद्यका वाक्यार्थ स्पष्ट है, किन्तु
भावार्थ गूढ़ हैं। राधाजी शक्ति हैं और श्रीकृष्ण शक्तिमान् तत्त्व हैं। "शक्तिशक्तिमतोरभेदः"-इस
वेदान्त-वाक्यका अर्थ यह है-किसी भी विचारसे शक्तिके आधारसे शक्तिको पृथक् नहीं किया
जा सकता है। किन्तु अचिन्त्य-शक्तिके प्रभावसे श्रीराधाकृष्ण परस्पर विलासके रसास्वादन
करनेके लिये नित्य पृथक् होनेपर भी युगपत् (सब समय) एक ही हैं॥५६॥
राधागोविन्दका मिलित तनु गौर हैं :-
सेइ दुइ एक एबे चैतन्य गोसाञि।
भाव आस्वादिते दोँ हे हैला एक ठाँइ ॥ ५७ ॥
चौथा अध्याय | १७५