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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2158

[ 5/12-20 पाँचवाँ अध्याय 141

[बायाँ स्तम्भ]
श्रीमिश्रके द्वारा पूछे जानेपर सेवकके द्वारा महाभागवत
परमहंस आत्माराम श्रीरायके कृत्यका वर्णन :-
रायेर दर्शन ना पाञा सेवके पुछिल।
रायेर वृत्तान्त सेवक कहिते लागिल ॥ 12 ॥
“दुइ देवकन्या हय परम सुन्दरी।
नृत्य-गीते सुनिपुणा, वयसे किशोरी ॥ 13 ॥
सेइ दुँहे लञा राय निभृत उद्याने।
निज-नाटक-गीतेर शिखाय नर्त्तने ॥ 14 ॥
श्रीमिश्रसे थोड़ी देर बैठनेके लिये प्रार्थना :-
तुमि इँहा बसि’ रह, क्षणेके आसिबेन।
ताँरे येइ आज्ञा देह, सेइ करिबेन॥” 15 ॥
अनुवाद—श्रीप्रद्युम्न मिश्रने श्रीरामानन्द रायको नहीं
देखकर उनके सेवकसे उनके विषयमें पूछा। सेवक
श्रीरामानन्द रायके वहाँ उपस्थित न होनेका कारण
बतलाते हुए कहने लगा,—“दो देवकन्याएँ (देवदासियाँ)
जो परम सुन्दरी हैं, नृत्य-गीतमें सुनिपुण तथा आयुमें
किशोरी हैं। उन्हीं दोनों देवकन्याओंको एकान्त उद्यानमें
ले जाकर श्रीरामानन्द राय स्वरचित नाटकके गीतके
अनुरूप नृत्य करनेकी शिक्षा दे रहे हैं। आप यहींपर
बैठे रहिये, वे कुछ ही क्षणमें आ जायेंगे। तब आप
उन्हें जो भी आज्ञा देंगे, वे वैसा ही करेंगे॥” 12-15 ॥
अनुभाष्य—‘निज-नाटक’,—श्रीरामानन्दराय-रचित
संस्कृत भाषामें लिखित ‘जगन्नाथवल्लभ’-नाटक ॥ 14 ॥
श्रीमिश्रके द्वारा प्रतीक्षा :-
तबे प्रद्युम्न मिश्र ताँहा रहिल बसिया।
रामानन्द राय सेइ दुइ-जन लञा ॥ 16 ॥
आत्माराम श्रीरामानन्दके द्वारा साक्षात्
श्रीराधाकी चिन्मयी सेवा :-
स्वहस्ते करेन तार अभ्यङ्ग-मर्द्दन।
स्वहस्ते करान स्नान, गात्र-सम्मार्ज्जन ॥ 17 ॥
अनुवाद—तब श्रीप्रद्युम्न मिश्र वहींपर बैठे रहे।
उधर श्रीरामानन्द रायने उन दोनों देवदासियोंको एकान्त

[दायाँ स्तम्भ]
उद्यानमें ले जाकर अपने हाथोंसे उन दोनोंकी तेलसे
मालिश की और अपने हाथोंसे ही उन्हें स्नान
करवाया। वास्तवमें श्रीरामानन्दने अपने हाथोंसे उनके
सम्पूर्ण शरीरका मार्जन किया॥ 16-17 ॥
अनुभाष्य—‘अभ्यङ्ग-मर्द्दन’,—तेलकी मालिश॥ 17 ॥
स्वहस्ते परान वस्त्र, सर्वाङ्ग मण्डन।
तबु निर्विकार राय-रामानन्देर मन ॥ 18 ॥
अनुवाद—श्रीरामानन्द रायने यद्यपि अपने हाथोंसे
ही उन देवदासियोंको वस्त्र पहनाये और उनके समस्त
अङ्गोंको अलङ्कारादिके द्वारा विभूषित किया, तथापि
उनका मन सम्पूर्णरूपसे विकाररहित था॥ 18 ॥
अनुभाष्य—‘मण्डन’,—अलङ्कारादिके द्वारा भूषित करना;
‘निर्विकार’,—स्त्री दर्शनादिके द्वारा प्राकृत-पुरुषाभिमानियोंके
समान अपनी इन्द्रियोंके तर्पणके निमित्त सर्वत्र अधोक्षज
श्रीराधाकृष्णके दर्शन करनेवाले (मध्यलीला 8/273, 274
और 276 संख्या देखें) परमहंसकुलचूड़ामणि विद्वत्-
संन्यासियोंके भी गुरु श्रीरामानन्दप्रभु जड़भोगपरायण
होकर कायिक अथवा मानसिक विकारके वशीभूत नहीं
हुए॥ 18 ॥
जड़भोगोंसे विरक्त विद्वत्-संन्यासी शिरोमणि, छह वेगोंको
जीतनेवाले श्रीरामानन्द-गोस्वामीका स्वभाव :-
काष्ठ-पाषाण-स्पर्शे हय यैछे भाव।
तरुणी-स्पर्शे रामानन्देर तैछे ‘स्वभाव’ ॥ 19 ॥
अनुवाद—युवती कन्याओंको स्पर्श करनेपर श्रीरामानन्द
रायका ऐसा भाव था मानो वे लकड़ी अथवा पत्थरको
स्पर्श कर रहे हों, इसलिये उनके शरीर और मनमें
कोई विकार नहीं आया॥ 19 ॥
अपनी अप्राकृत सिद्धदेहमें गोपीभावसे रागात्मिका-भक्तिका
पालन करनेवाले महाभागवत श्रीरायका अपनी ईश्वरी
श्रीराधाका अप्राकृत चिद्विलास-कैङ्कर्य :-
सेव्य-बुद्धि आरोपिया करेन सेवन।
स्वाभाविक दासीभाव करेन आरोपण ॥ 20 ॥