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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2108, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2108

[ 3/181–188 तीसरा अध्याय 91
विद्वानोंके अनुरोधसे श्रीठाकुरके
द्वारा श्लोककी व्याख्या :-
एइ श्लोकेर अर्थ कर पण्डितेर गण ॥"
सब कहे,—"तुमि कह अर्थ-विवरण ॥" 181 ॥
अनुवाद—श्लोक पढ़नेके बाद श्रीहरिदास ठाकुरने
कहा,—“हे पण्डितगण ! आप इस श्लोकका अर्थ
बतलाइये।” सभी विद्वानोंने कहा,—“आप ही इस
श्लोकके अर्थकी व्याख्या कीजिये ॥” 181 ॥
श्रीठाकुरके द्वारा शुद्धनाम और
नामाभास-तत्त्वकी व्याख्या :-
हरिदास कहेन,—“यैछे सूर्येर उदय।
उदय ना हैते आरम्भे तमेर हय क्षय ॥ 182 ॥
चौर-प्रेत-राक्षसादिर भय हय नाश।
उदय हैले धर्म-कर्म-आदि परकाश ॥ 183 ॥
नामके फलसे कृष्णप्रेमका उदय :-
ऐछे नामोदयारम्भे पाप-आदिर क्षय।
उदय कैले कृष्णपदे हय प्रेमोदय ॥ 184 ॥
नामाभासके फलसे ही मुक्ति :-
'मुक्ति' तुच्छ-फल हय नामाभास हैते।
ये मुक्ति भक्त ना लय, से कृष्ण चाहे दिते ॥" 185 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने कहा,—“जैसे सूर्य
उदित होनेके समय, किन्तु अभी सूर्य उदित नहीं हुआ
है, अन्धकारका नाश होना आरम्भ हो जाता है। चोर,
प्रेत, राक्षस आदिका भय समाप्त हो जाता है। जब
सूर्य उदित हो जाता है, तब सब कुछ प्रकाशित हो
जाता है और सभी अपने धर्म-कर्म आदिमें लग जाते
हैं। इसी प्रकार नाम उदित होनेके आरम्भमें (अर्थात्
अपराधरहित नामाभास) ही समस्त पापोंका तुरन्त नाश
कर देता है। और नामके सम्पूर्ण रूपसे उदित होनेपर
श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रेमका उदय होता है। नामाभाससे
ही 'मुक्ति'रूपी तुच्छ फल प्राप्त हो जाता है। श्रीकृष्णके
द्वारा मुक्ति देनेकी इच्छा करनेपर भी भक्त उसे ग्रहण
नहीं करते ॥” 182-185 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—शुद्धभक्तको श्रीकृष्ण मुक्ति देना
चाहनेपर भी वे उसे नहीं लेते ॥ 185 ॥
श्रीमद्भागवत (6/2/49) में—
म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन् पुत्रोपचारितम्।
अजामिलोऽप्यगाद्धाम किमुत श्रद्धया गृणन् ॥ 186 ॥
अनुवाद—पुत्रको लक्ष्य करके हरिनाम ग्रहण करके
ही मरणोन्मुख अजामिलने जब वैकुण्ठधाममें गमन
किया, तब श्रद्धापूर्वक नाम लेनेसे क्या होगा, उसे कहा
नहीं जा सकता (वैकुण्ठगमनकी तो बात ही नहीं) ॥ 186 ॥
अनुभाष्य—अन्त्यलीला 3/63 संख्या देखें ॥ 186 ॥
श्रीमद्भागवत (3/29/13) में—
सालोक्य-सार्ष्टि-सारूप्य-सामीप्यैकत्वमप्युत।
दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः ॥ 187 ॥
अनुवाद—(मेरे द्वारा) सालोक्य (वैकुण्ठवास), सार्ष्टि
(ऐश्वर्यसम्पत्ति), सारूप्य (चतुर्भुजाकार), सामीप्य
(निकटवास) और एकत्व (सायुज्य या अभेदगति)
प्रदान करनेपर भी भक्त उन्हें ग्रहण नहीं करते हैं,
क्योंकि मेरी अप्राकृत सेवाके अतिरिक्त उनकी कोई भी
अभिलाषा नहीं है ॥ 187 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 4/207 संख्या देखें ॥ 187 ॥
नाममें अर्थवादी पाखण्डी गोपाल-चक्रवर्त्तीका वृत्तान्त :-
गोपाल-चक्रवर्त्ती नाम एकजन।
मजुमदारेर घरे सेइ आरिन्दा-ब्राह्मण ॥ 188 ॥
अनुवाद—गोपाल चक्रवर्त्ती नामक एक व्यक्ति
श्रीहिरण्य एवं श्रीगोवर्धन मजुमदारके घरपर एक प्रधान
आरिन्दा (कर-संग्रहकारी) पदपर नियुक्त था ॥ 188 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—‘आरिन्दा',—तहसील-संग्रहकारी
पैदल-सिपाही (पत्र और राजकर-वाहक पैदल-
सिपाही) ॥ 188 ॥