श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2098, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 3/98-107 तीसरा अध्याय 81
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने जब अपने घरका
त्याग किया, तब वे बेनापोलके वनमें आकर कुछ
दिनों तक रहे॥98॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'बेनापोल',—यशोहर-जिलेका एक
ग्राम ॥ 98 ॥
अनुभाष्य—'बेनापोल',—ई, वि, आर, रेल लाइनमें
खुलनाके मार्गपर बनगाँओ जंक्शनके बाद बेनापोल
स्टेशन (वर्तमानमें बाङ्गलादेशमें) है; उसका निकटवर्ती
स्थान ही 'बेनापोल' है ॥ 98 ॥
निर्जन-वने कुटीर करि' तुलसी-सेवन।
रात्रि-दिने तिन लक्ष नामसङ्कीर्त्तन ॥ 99 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरने निर्जन वनमें एक
कुटिया बनायी और वहाँपर उन्होंने तुलसीजीका पौधा
लगाया और वे उनकी सेवा करते थे। वे प्रतिदिन
रात-दिन तीन लाख नाम-सङ्कीर्त्तन करते थे ॥ 99 ॥
ब्राह्मणेर घरे करे भिक्षा-निर्वाहण।
प्रभावे सकल लोक करये पूजन ॥ 100 ॥
अनुवाद—वे शरीरका निर्वाह किसी ब्राह्मणके घरसे
भिक्षा माँगकर करते थे। श्रीहरिदास ठाकुरके भजनका
ऐसा प्रभाव था कि उस क्षेत्रके सभी लोग उनका बहुत
सम्मान करते थे ॥ 100 ॥
सेइ देशाध्यक्ष नाम—रामचन्द्र खाँन।
वैष्णवविद्वेषी सेइ पाषण्ड-प्रधान ॥ 101 ॥
अनुवाद—उस बेनापोलके ज़मींदारका नाम
रामचन्द्र-खाँन था। वह वैष्णव-विद्वेषी और महा
पाखण्डी था ॥ 101 ॥
हरिदासे लोके पूजे, सहिते ना पारे।
ताँर अपमान करिते नाना उपाय करे ॥ 102 ॥
अनुवाद—लोग श्रीहरिदास ठाकुरको इतना सम्मान
देते थे, यह रामचन्द्र खाँनसे सहन नहीं हुआ। इसलिये
वह श्रीहरिदास ठाकुरको अपमानित करनेके लिये
अनेक उपाय करने लगा ॥ 102 ॥
कोनप्रकारे हरिदासेर छिद्र नाहि पाय।
वेश्यागणे आनि' करे छिद्रेर उपाय ॥ 103 ॥
अनुवाद—रामचन्द्र खाँन श्रीहरिदास ठाकुरके चरित्रमें
किसी प्रकारका कोई दोष ढूँढ़ नहीं पाया। तब उसने
वेश्याओंको बुलवाकर श्रीहरिदास ठाकुरको पतित करनेका
षड़यन्त्र रचा ॥ 103 ॥
वेश्यागणे कहे, —“एइ वैरागी हरिदास।
तुमि-सब कर इहार वैराग्य नाश ॥” 104 ॥
अनुवाद—रामचन्द्र खाँनने वेश्याओंसे कहा, —“हरिदास
नामक एक वैरागी है। तुम सब किसी प्रकारसे इसके
वैराग्यका नाश करो ॥” 104 ॥
वेश्यागण-मध्ये एक सुन्दरी युवती।
से कहे, —“तिनदिने हरिब ताँर मति ॥” 105 ॥
अनुवाद—उन वेश्याओंमें एक अत्यन्त सुन्दरी
युवती थी। उसने कहा, —“मैं केवल तीन दिनमें ही
हरिदासकी मतिको हर लूँगी ॥” 105 ॥
खाँन कहे, —“मोर पाइक याउक तोमार सने।
तोमार सहित एकत्र तारे धरि' येन आने ॥” 106 ॥
अनुवाद—रामचन्द्र खानने कहा, —“मेरा सिपाही
तुम्हारे साथ जायेगा। जैसे ही वह हरिदासको तुम्हारे
साथ देखेगा, उसे रङ्गे हाथों पकड़कर ले आयेगा ॥” 106 ॥
वेश्या कहे, —“मोर सङ्ग हउक एकबार।
द्वितीयबारे धरिते पाइक लइमु तोमार ॥” 107 ॥
अनुवाद—वेश्याने कहा, —“पहले एकबार मेरे साथ
उसका सङ्ग होने दो, फिर दूसरी बार मैं आपके
सिपाहीको उसे पकड़नेके लिये साथ ले जाऊँगी ॥” 107 ॥