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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2093, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2093

76 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 3/62-68 ]
(अपराधरूपतमोऽतीतः ईषत् प्रकाशः) अन्तःकरणकुहरे (चित्तगह्वरे) (उच्चारयन्) धाम (वैकुण्ठपदं) अगात् (जगाम), श्रद्धया
प्रोद्यन् (प्रकटयन्) महापातकध्वान्तराशिं (महापातकम् एव (अप्राकृत-दृढ़विश्वासेन सह तत् नाम) गृणन् [सन्] किमुतः
ध्वान्तं तस्य राशिम् अन्धकारततिं) हन्त क्षपयति (दूरीकरोति), (किं वक्तव्यम्)?
तं पावनानां पावनं (पवित्री कुर्वतां तीर्थानाम् अपि पावनं श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 63 ॥
पवित्र्यकरम्) उत्तमःश्लोकमौलिम् (उत् उद्गच्छति तमः यस्मात्
तथाभूतः श्लोकः कीर्त्तिः येषां तेषां मौलिं शिरोभूषणं) तं श्लोकका अर्थ :-
(श्रीकृष्णं) श्रद्धा-रज्यन्मतिः (श्रद्धया सुदृढ़विश्वासेन रज्यन्ती नामाभासे 'मुक्ति' हय सर्वशास्त्रे देखि।
उल्लसन्ती रागमयी मतिः बुद्धिः यस्य तथाभूतः सन्) अतितरां श्रीभागवते ता'ते अजामिल-साक्षी॥" 64 ॥
(शीघ्रं) निर्व्याजं (निष्कपटं यथा स्यात्तथा) भज।
श्लोक-भावानुवाद-हे गुणनिधे, जिन भगवान् श्रीकृष्णके अनुवाद-नामाभाससे मुक्ति होती है, ऐसा सभी
नामरूपी सूर्यका आभास अर्थात् अपराधरूपी तमः से शास्त्रोंमें दिखलायी देता है। श्रीभागवतमें वर्णित अजामिल
अतीत अल्प प्रकाश चित्तरूपी गुहामें प्रकट होते ही इसके साक्षी हैं॥" 64 ॥
महापापके अन्धकारसमूहको नष्ट करके दूर कर देता महाप्रभुके हर्षकी वृद्धि, पुनः प्रश्न :-
है, आप इन पवित्रकारी तीर्थोंको भी पवित्र करनेवाले शुनिया प्रभुर सुख बाड़ये अन्तरे।
सर्वश्रेष्ठ कीर्त्तिवाले श्रीकृष्णका सुदृढ़ विश्वासके साथ पुनरपि भङ्गी करि' पुछये ताँहारे॥ 65 ॥
रागमयी मति युक्त होकर शीघ्र निष्कपट भावसे भजन स्थावर-जङ्गम-जीवोंके उद्धारके उपायकी जिज्ञासा :-
करो॥ 62 ॥ “पृथिवीते बहुजीव—स्थावर-जङ्गम।
नामाभाससे मुक्ति :- इहा सबार कि-प्रकारे हइबे मोचन ?” 66 ॥
श्रीमद्भागवत (6/2/49) में-
म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन् पुत्रोपचारितम्। अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरके वचन सुनकर महाप्रभुके
अजामिलोऽप्यगाद्धाम किमुत श्रद्धया गृणन्॥ 63 ॥ हृदयमें आनन्द वर्धित हो रहा था, इसलिये उन्होंने
भङ्गिमाके द्वारा श्रीहरिदास ठाकुरसे पूछा,-“पृथ्वीपर तो
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 63 ॥ स्थावर और जङ्गम-बहुत प्रकारके जीव हैं। इन
अमृतप्रवाह भाष्य-पुत्रको लक्ष्य करके हरिनाम सबका उद्धार किस प्रकार होगा?" 65-66 ॥
ग्रहण करके ही मरणोन्मुख अजामिलने जब वैकुण्ठधाममें
गमन किया, तब श्रद्धापूर्वक नाम लेनेसे क्या होगा, उसे श्रीहरिदासका उत्तर :-
कहा नहीं जा सकता (वैकुण्ठगमनकी तो बात ही हरिदास कहे,-“प्रभु, से कृपा तोमार।
नहीं) ॥ 63 ॥ स्थावर-जङ्गम आगे करियाछ निस्तार ॥ 67 ॥
अनुभाष्य-मृत्युके समय सङ्केत नामाभासके फलसे अनुवाद-श्रीहरिदास ठाकुरने उत्तर दिया,-“हे प्रभो !
पापमुक्त अजामिलके पुनर्जीवन प्राप्त करनेके बाद आपने अपनी कृपासे स्थावर और जङ्गम जीवोंका
पश्चात्ताप सहित श्रीहरिकी आराधनाके फलसे वैकुण्ठमें पहलेसे ही उद्धार कर दिया है॥ 67 ॥
जानेका वर्णन करके श्रीशुकदेव गोस्वामी अध्यायके स्थावर और जङ्गम, दोनों प्रकारके जीवोंके लिये
अन्तमें राजा परीक्षितको प्रसङ्गवशतः नामाभास और उच्चनाम-सङ्कीर्तन श्रवणके प्रभावका वर्णन :-
शुद्धनामके माहात्म्यके वैशिष्ट्यका वर्णन कर रहे हैं- तुमि ये करियाछ एड उच्च सङ्कीर्त्तन ।
अजामिलः म्रियमाणः (मृत्युमुखासीनः अवशत्वेन श्रद्धाविहीनोऽपि) स्थावर-जङ्गमेर सेइ हयत' श्रवण ॥ 68 ॥
पुत्रोपचारितं (नारायणेति पुत्र-नामतया कथितं) हरेः नाम गृणन्