श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 2/142-147 दूसरा अध्याय 61
लिये जाते, तब छोटे-हरिदास दूरमें रहकर ही उनके
दर्शन करते ॥ 142 ॥
धर्मसेतु धर्मरक्षक महाप्रभुका परम कारुण्य :-
महाप्रभु-कृपासिन्धु, के पारे बुझिते?
निज-भक्ते दण्ड करेन धर्म बुझाइते ॥ 143 ॥
अनुवाद-महाप्रभु कृपाके सिन्धु हैं, इसे कौन
समझ सकता है? जगत्में धर्मकी शिक्षा देनेके लिये
वे अपने भक्त तकको दण्ड प्रदान करते हैं॥ 143 ॥
अनुभाष्य-यद्यपि कपटतापूर्वक अवैध स्त्री-सङ्ग
भी पापोंमें-से एक पाप मात्र है, तथापि जगतवासियोंको
दो मुख्य शिक्षा देनेके लिये महाप्रभुने अपने भक्त
हरिदासको दण्ड प्रदान किया-(1) वास्तविक वैष्णवोंकी
त्रिगुणातीत अप्राकृत परमोच्च स्थिति है एवं (2)
भविष्यकालके बिद्ध प्राकृत-सहजिया आदि उपधर्म और
अपधर्मका पालन करनेवाले नारकी व्यक्तियोंका व्यवहार
अत्यन्त अधर्मकी नींवके ऊपर बना हुआ और शुद्ध
वैष्णव धर्मके सम्पूर्ण विपरीत और स्वतन्त्र है। श्रीमाधवी
देवी-उच्चाधिकारिणी महाभागवत हैं; उनके पास जाकर
चावलकी भिक्षा ग्रहण करना हरिदास जैसे प्रभु-पार्षदका
अवैध-कार्य नहीं होनेपर भी भविष्यमें ऐसे उदाहरण
अथवा आदर्शका अनुकरण करके अनेक लोग शठता
और कपटताका विस्तार करके कलिजनोचित
अवैष्णव-मतका प्रचार कर सकते हैं, - उसको रोकनेके
उद्देश्यसे जगद्गुरु लोकशिक्षक भगवान्की यह
हरिदास-सम्बन्धिनी दण्ड-लीला है। श्रीगौरसुन्दरने असामान्य
दयाके सागर होनेपर भी कलियुगके जीवोंकी दुर्बलताको
समझकर ही इस प्रकारके सङ्गत्याग रूपी सुकठोर
दण्डका विधान करके अमन्दोदया-दयाकी पराकाष्ठाको
प्रदर्शित किया ॥ 143 ॥
छोटे हरिदासके दण्डको देखकर साधकोंका पुरुष
अथवा भोक्ताके अभिमानसे इन्द्रिय-तर्पणके उद्देश्यसे
भोगमय नेत्रोंसे भोग्य-स्त्री-दर्शनका त्याग :-
देखि' त्रास उपजिल सब भक्तगणे।
स्वप्नेह छाड़िल सबे स्त्री-सम्भाषणे ॥ 144 ॥
अनुवाद-छोटे-हरिदासको दिये जा रहे दण्डको
देखकर सभी भक्तोंके हृदयमें भय उत्पन्न हो गया।
इसलिये सभीने स्वप्न तकमें भी स्त्रीके साथ सम्भाषण
करना छोड़ दिया ॥ 144 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'त्रास उपजिल सब भक्तगणे',-
वैरागी-वेषधारी (साधक) भक्तोंमें ऐसा भय उपस्थित
हुआ कि उन्होंने किसी स्त्रीके साथ बात तक करना
छोड़ दिया ॥ 144 ॥
अनुभाष्य- 'स्त्री-सम्भाषण',- भोक्ता अथवा पुरुष-
अभिमानसे अपनी इन्द्रियोंकी भोग्या समझकर स्त्रीके
साथ विषयी व्यक्तिकी जो बातचीत होती है, वह
स्त्री-सम्भाषण है॥ 144 ॥
एक वर्षके बाद भी महाप्रभुकी अटल निरपेक्षता :-
एइमते हरिदासेर एकवत्सर गेल।
तबु महाप्रभुर मने प्रसाद नहिल ॥ 145 ॥
अनुवाद-इस प्रकार छोटे-हरिदासका एक वर्ष
व्यतीत हो गया, किन्तु तब भी महाप्रभुके मनमें उनके
प्रति कृपाका आभास भी नहीं दिखा ॥ 145 ॥
महाप्रभुके ऐसे व्यवहारको देखकर छोटे-हरिदासके
द्वारा महाप्रभुकी सेवाकी प्राप्तिका सङ्कल्प
लेकर प्रयागमें जाकर त्रिवेणीमें देहत्याग :-
रात्रि-शेषे प्रभुरे दण्डवत् हञा।
प्रयागेते गेल कारेह किछु ना बलिया ॥ 146 ॥
अनुवाद-एक रात्रिके अन्तमें छोटे-हरिदास महाप्रभुको
बाहरसे ही दण्डवत् प्रणाम करके बिना किसीको बताये
प्रयाग चले गये ॥ 146 ॥
प्रभुपद-प्राप्ति लागि' सङ्कल्प करिल।
त्रिवेणी प्रवेश करि' प्राण छाड़िल ॥ 147 ॥
अनुवाद-छोटे-हरिदासने महाप्रभुके चरणोंकी प्राप्तिका
सङ्कल्प किया और त्रिवेणीमें प्रवेश करके उन्होंने अपने
प्राण त्याग दिये ॥ 147 ॥