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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2028, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2028

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य (transcription) दिया गया है:

[ 1/75-80 पहला अध्याय 11

[बायाँ स्तम्भ]
श्रीराधाभावमें निमग्न महाप्रभुके द्वारा उच्चारित
गूढ़-श्लोकका मर्मार्थ एकमात्र श्रीस्वरूप-दामोदरके
अतिरिक्त सभीके लिये दुर्बोध्य :-
सामान्य एक श्लोक प्रभु पड़ेन कीर्तने।
केने श्लोक पड़े—इहा केह नाहि जाने॥ 75॥
अनुवाद—महाप्रभुने कीर्तन करते हुए एक सामान्य
श्लोक पढ़ा। महाप्रभु किस भावसे उस श्लोकको पढ़
रहे थे—इसे कोई भी नहीं जानता था॥ 75॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'केने'—किस भावसे॥ 75॥
उस श्लोकके भावकी द्योतक पदावलीका गान करके
श्रीस्वरूपके द्वारा महाप्रभुका सन्तोष-विधान :-
सबे एका स्वरूप श्लोकेर अर्थ जाने।
श्लोकानुरूप पद करान आस्वादने॥ 76॥
अनुवाद—उस श्लोकका अर्थ एकमात्र श्रीस्वरूप
दामोदर ही जानते थे। वे महाप्रभुके द्वारा उच्चारित
श्लोकोंके भावोंके अनुरूप पदोंका गान करके महाप्रभुको
उनका आस्वादन करवाते थे॥ 76॥
श्रीरूपके द्वारा महाप्रभुके मनके भावोंके
अनुसार श्लोककी रचना :-
रूप-गोसाञि प्रभुर जानिया अभिप्राय।
सेइ अर्थे श्लोक कैला प्रभुरे ये भाय॥ 77॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामी महाप्रभुके द्वारा उस
श्लोकके पाठके अभिप्रायको जान गये। उन्होंने उस
श्लोकके भावके अनुरूप, महाप्रभुके मनभावन एक नये
श्लोककी रचना की॥ 77॥
महाप्रभुके द्वारा उच्चारित श्लोक :-
काव्यप्रकाश (1/4) में, साहित्यदर्पण (1/10)में और
पद्यावली (382)में—
यः कौमारहरः स एव हि वरस्ता एव चैत्रक्षपा-
स्ते चोन्मीलितमालतीसुरभयः प्रौढ़ाः कदम्बानिलाः।
सा चैवास्मि तथापि तत्र सुरतव्यापारलीलाविधौ
रेवारोधसि वेतसीतरुतले चेतः समुत्कण्ठते॥ 78॥

[दायाँ स्तम्भ]
अनुवाद—एक नायिका अपनी एक सखीसे कहती
है,—“जिसने कौमारावस्थामें मेरे चित्तका हरण किया था,
अब वही मेरा वर है अर्थात् वैवाहिक पति है। उसके
साथ कौमारावस्थामें प्रथम मिलनके समय जो चैत्रमाहकी
ज्योत्स्नामयी रात्रि थी, अब भी वही चैत्रमाहका
ज्योत्स्नामय रात्रिकाल है। प्रथम मिलनके समयकी
भाँति खिली हुई मालती पुष्पोंकी भीनी-भीनी मधुर
सुगन्धयुक्त वायु अब भी कदम्ब वनकी ओरसे प्रवाहित
हो रही है; मैं भी वही हूँ; फिर भी उसी रेवा नदीके
तटपर निर्जन सुशीतल प्रदेशमें बेंतके वृक्षके नीचे प्रथम
मिलनके समयवाली सुरत-व्यापारलीला अर्थात् प्रेममय
विहारके लिये मेरा मन उत्कण्ठित हो रहा है॥” 78॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 1/58 संख्या देखें॥ 78॥
पद्यावली (383)में श्रीरूपगोस्वामिकृत-श्लोक :-
प्रियः सोऽयं कृष्णः सहचरि कुरुक्षेत्रमिलित-
स्तथाहं सा राधा तदिदमुभयोः सङ्गमसुखम्।
तथाप्यन्तःखेलन्मधुरमुरलीपञ्चमजुषे
मनो मे कालिन्दीपुलिनविपिनाय स्पृहयति॥ 79॥
अनुवाद—हे सहचरी! मेरे वे अतिप्रिय कृष्ण
मुझसे अभी कुरुक्षेत्रमें मिल रहे हैं, मैं भी वही राधा
हूँ; और हम दोनोंके मिलनका सुख भी वैसा ही है;
तथापि इन कृष्णकी वनमें क्रीड़ाशील मुरलीके पञ्चमसुरके
आनन्दसे प्लावित कालिन्दीके तटपर वृन्दावनमें जानेकी
स्पृहा मेरे हृदयमें हो रही है॥ 79॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 1/76 संख्या देखें॥ 79॥
तालपत्रे श्लोक लिखि' चालेते राखिला।
समुद्रस्नान करिवारे रूप-गोसाञि गेला॥ 80॥
अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीने श्लोककी रचना करके
उसे एक तालपत्रपर लिखकर अपने वास स्थानपर
फूसकी छतमें उसे फंसाकर रख दिया और समुद्रमें
स्नानके लिये चले गये॥ 80॥