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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2025, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2025

8 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/55–64 ]
वन्दना की और उन सभी भक्तोंने कृपा करके साथ कुछ देर तक इष्टगोष्ठी करके मध्याह्न कृत्य
श्रीरूपका आलिङ्गन किया ॥ 55 ॥ करनेके लिये चले जाते ॥ 60 ॥
श्रीरूपपर कृपा करनेके लिये महाप्रभुके द्वारा श्रीनिताइ महाप्रभुकी कृपाकी प्राप्तिसे श्रीरूपको आनन्द :–
और श्रीअद्वैत–दोनों प्रभुओंसे अनुरोध :– एइमत प्रतिदिन प्रभुर व्यवहार।
“अद्वैत, नित्यानन्द, तोमरा दुइजने।” प्रभुकृपा पाञा रूपेर आनन्द अपार ॥ 61 ॥
प्रभु कहे,—“रूपे कृपा कर काय्मने ॥ 56 ॥
तोमा-दुँहार कृपाते इँहार हउ शक्ति। अनुवाद—महाप्रभु प्रतिदिन ऐसा ही व्यवहार करते
याते विवरिते पारेन कृष्णरसभक्ति ॥” 57 ॥ थे। महाप्रभुकी कृपा प्राप्त करके श्रीरूपको अपार
आनन्द होता था ॥ 61 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्य और श्रीनित्यानन्द भक्तोंके साथ महाप्रभुकी नीलाचल–लीला :–
प्रभुसे कहा,—“आप दोनों श्रीरूपपर काय और मनसे भक्तगण लञा कैला गुण्डिचा-मार्जन।
कृपा कीजिये। आप दोनोंकी कृपासे इसमें ऐसी शक्ति आइतोटा आसि' कैला वन्य-भोजन ॥ 62 ॥
सञ्चरित हो जाय, जिससे यह कृष्णरस-भक्तिका वर्णन
कर सके ॥” 56–57 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने रथयात्राके पूर्व दिन अपने
भक्तोंको साथमें लेकर गुण्डिचा मन्दिरका मार्जन किया
श्रीरूप—महाप्रभुके समस्त भक्तोंकी ही प्रीतिके पात्र :– और फिर उन्होंने सभी भक्तोंके साथ आइतोटामें आकर
गौड़ीया, उड़िया, यत प्रभुर भक्तगण। उद्यान-भोजन (प्रसाद-सेवन) किया ॥ 62 ॥
सबार हइल रूप स्नेहेर भाजन ॥ 58 ॥
अनुभाष्य—‘आइतोटा’—गुण्डिचा मन्दिरके निकट
अनुवाद—महाप्रभुके गौड़ीय, उड़िया आदि जितने स्थित उपवन ॥ 62 ॥
भी भक्त थे, श्रीरूप उन सभीके स्नेहके पात्र बन
गये ॥ 58 ॥ सभी भक्तोंके आनन्दको देखकर श्रीरूप
और श्रीहरिदासको आनन्द :–
स्वयं महाप्रभुके द्वारा श्रीरूपको प्रतिदिन प्रसाद खाय, 'हरि' बले सर्वभक्तजन।
दर्शन और प्रसाद देना :– देखि' हरिदास-रूपेर हरषित मन ॥ 63 ॥
प्रतिदिन आसि' रूपे करेन मिलने।
मन्दिरे ये प्रसाद पान, देन दुइ जने ॥ 59 ॥ अनुवाद—सभी भक्तोंने प्रसाद ग्रहण किया और
‘हरिध्वनि’ दी, इसे देखकर श्रीहरिदास ठाकुर और
अनुवाद—महाप्रभु प्रतिदिन आकर श्रीरूपसे मिलते। श्रीरूपके मनमें हर्ष हुआ ॥ 63 ॥
वे श्रीजगन्नाथ मन्दिरमें जो प्रसाद पाते, उसे वे
श्रीहरिदास ठाकुर तथा श्रीरूपको दे देते ॥ 59 ॥ महाप्रभुके बचे हुए उच्छिष्टकी प्राप्तिसे
दोनोंका प्रेमसे नृत्य :–
श्रीरूपके साथ महाप्रभुकी कृष्णकथा :– गोविन्दद्वारा प्रभुर शेष-प्रसाद पाइला।
इष्टगोष्ठी दुइजने करि' कतक्षण। प्रेमे मत्त दुइजन नाचिते लागिला ॥ 64 ॥
मध्याह्न करिते प्रभु करिला गमन ॥ 60 ॥
अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीरूप श्रीगोविन्दसे
अनुवाद—महाप्रभु श्रीहरिदास ठाकुर और श्रीरूपके महाप्रभुके बचे हुए उच्छिष्ट प्रसादको प्राप्त करके प्रेममें