श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2023, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें6 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 1/37-46 ]
अनुभाष्य- 'दुइ भाइ'—श्रीरूप और उनके छोटे
भाई श्रीअनुपम ॥ 37 ॥
श्रीरूपकी पुरीमें महाप्रभुके दर्शनके लिये यात्रा :-
रूप-गोसाञि प्रभुपाशे करिला गमन।
प्रभुरे देखिते ताँर उत्कण्ठित मन ॥ 38 ॥
अनुवाद-श्रीरूप गोस्वामीका मन महाप्रभुके दर्शनके
लिये उत्कण्ठित हो रहा था, इसलिये वे महाप्रभुके पास
जानेके लिये पुरीकी ओर चल पड़े॥ 38 ॥
श्रीअनुपमकी गङ्गाप्राप्ति हेतु विलम्ब होनेके कारण
महाप्रभुके दर्शनोंके लिये जानेवाले गौड़ीय-यात्रियोंके
साथ श्रीरूपका मिलन नहीं होना :-
अनुपमेर लागि' ताँर विलम्ब हइल।
भक्तगण-पाश आइला, लाग् ना पाइल ॥ 39 ॥
अनुवाद-गौड़देशमें श्रीअनुपमके देहत्यागके कारण
श्रीरूप गोस्वामीको विलम्ब हुआ, तब तक गौड़ीय भक्त
पुरीके लिये प्रस्थान कर चुके थे, इसलिये उनकी उन
भक्तोंके साथ भेंट नहीं हो पायी ॥ 39 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'लाग् ना पाइल'—श्रीशिवानन्दादि
भक्तगण महाप्रभुके पास जा रहे हैं, ऐसा सुनकर
श्रीरूपने विचार किया कि वे भी उनके साथ नीलाचल
जायेंगे, किन्तु वे उनके साथ भेंट नहीं कर पाये,
क्योंकि वे पहले ही नीलाचलके लिये चले गये
थे॥ 39 ॥
सत्यभामापुरमें सत्यभामादेवीके उपदेशकी प्राप्ति ही
ललितमाधवकी रचनाके शुभारम्भका मूल कारण :-
उड़िया-देशे 'सत्यभामापुर'—नामे ग्राम।
एक रात्रि सेइ ग्रामे करिला विश्राम ॥ 40 ॥
रात्रे स्वप्ने देखे, -एक दिव्यरूप नारी।
सम्मुखे आसिया आज्ञा दिला कृपा करि' ॥ 41 ॥
“आमार नाटक पृथक् करह रचन।
आमार कृपाते नाटक हबे विलक्षण ॥ ”42 ॥
अनुवाद-उड़ीसा-देशमें 'सत्यभामापुर'-नामक एक
गाँव है। श्रीरूप गोस्वामीने पुरी जाते हुए उस गाँवमें
एक रात्रि विश्राम किया था। उस रात्रिमें उन्होंने एक
स्वप्न देखा कि एक दिव्य रूपवती नारीने उनके
सम्मुख आकर उन्हें कृपापूर्वक आज्ञा देते हुए कहा, -“तुम
मेरे नाटककी पृथक् रूपसे रचना करना, मेरी कृपासे
तुम्हारे द्वारा रचित वह नाटक विलक्षण (उत्कृष्ट)
होगा ॥ ”40-42 ॥
अनुभाष्य-कटक-जिलेके अन्तर्गत जान्कादेइपुरके
निकटमें ही 'सत्यभामापुर'-ग्राम है ॥ 40 ॥
श्रीरूपका मन-ही-मनमें विचार :-
स्वप्न देखि' रूप-गोसाञि करिला विचार।
'सत्यभामार आज्ञा-पृथक् नाटक करिवार ॥ 43 ॥
एकत्र वर्णित व्रज और पुरकी लीलाको पृथक् नाटकोंके
आकारमें वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा :-
व्रज-पुर-लीला एकत्र करियाछि गठन।
दुइ भाग करि' एबे करिमु रचना ॥ '44 ॥
अनुवाद-उस स्वप्नको देखकर श्रीरूप-गोस्वामीने
मनमें विचार किया, - 'श्रीसत्यभामा देवीने मुझे पृथक्
नाटक रचना करनेकी आज्ञा दी है। मैंने तो व्रज तथा
पुरकी लीलाओंको एक ही साथ लिखा है, किन्तु अब
मैं इस नाटकके दो भाग करके ही उनकी रचना
करूँगा ॥ '43-44 ॥
पुरीमें सिद्धबकुल-मठमें ठाकुर-श्रीहरिदासके
वासस्थानपर पहुँचना :-
भाविते भाविते शीघ्र आइला नीलाचले।
आसि' उत्तरिला हरिदास-वासास्थले ॥ 45 ॥
अनुवाद-ऐसा विचार करते-करते श्रीरूप गोस्वामी
शीघ्र ही नीलाचल आ पहुँचे और वे श्रीहरिदास
ठाकुरके वासस्थानपर आये ॥ 45 ॥
ठाकुरकी स्नेहपूर्ण उक्ति :-
हरिदास-ठाकुर ताँरे बहु कृपा कैला।
“तुमि आसिबे, -मोरे प्रभु ये कहिला ॥ ”46 ॥