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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2020, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2020

[ 1/12–21 पहला अध्याय 3
[बायाँ स्तम्भ]
अनुवाद—पहले मध्यलीलामें लिखे सूत्रोंके अनुसार
मैंने उनके विषयमें जो पहले नहीं लिखा है, अब उसे
विस्तारसे लिखूँगा ॥ 12 ॥
गौड़में महाप्रभुके वृन्दावनसे पुरीमें
आगमनका समाचार भेजना :—
वृन्दावन हैते प्रभु नीलाचले आइला।
स्वरूप-गोसाञि गौड़े वार्त्ता पाठाइला ॥ 13 ॥
शचीमाताके द्वारा समाचार सुनना और
भक्तोंके द्वारा पुरी जानेकी चेष्टा :—
शुनि' शची आनन्दित, सब भक्तगण।
सबे मिलि' नीलाचले करिला गमन ॥ 14 ॥
अनुवाद—श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने महाप्रभुके
वृन्दावनसे नीलाचल आनेके समाचारको गौड़देशमें
भेजा। इस समाचारको सुनकर श्रीशचीमाता और
गौड़देशके समस्त भक्त बहुत आनन्दित हुए। सभी
गौड़ीय भक्त मिलकर नीलाचलकी ओर चल दिये॥ 13–14॥
श्रीअद्वैताचार्य और श्रीशिवानन्दके निकट
समस्त भक्तोंका आगमन :—
कुलीनग्रामी भक्त आर यत खण्डवासी।
आचार्य, शिवानन्दे मिलिला सबे आसि' ॥ 15 ॥
अनुवाद—कुलीनग्रामवासी और श्रीखण्डवासी समस्त
भक्त तथा श्रीअद्वैताचार्य श्रीशिवानन्द सेनके वासस्थानपर
साथ आकर उनसे मिले ॥ 15 ॥
अनुभाष्य—'आचार्य'—श्रीअद्वैत आचार्य ॥ 15 ॥
सभीकी व्यवस्था करनेवाले श्रीशिवानन्द :—
शिवानन्द करे सबार घाटि समाधान।
सबारे पालन करे, देय वासा-स्थान ॥ 16 ॥
अनुवाद—नीलाचल जाते हुए श्रीशिवानन्द सेन
मार्गके और नदी पार करनेके सब शुल्कका भुगतान,
सभीके भोजन तथा वासस्थानका भी प्रबन्ध कर रहे
थे ॥ 16 ॥
[दायाँ स्तम्भ]
शिवानन्दके भगवद्भक्त कुत्तेका वृत्तान्त :—
एक कुक्कुर चले शिवानन्दे-सने।
भक्ष्य दिया लञा चले करिया पालने ॥ 17 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनके साथ एक कुत्ता भी
नीलाचलकी ओर चल रहा था। श्रीशिवानन्द सेन उसे
भी भोजनादि देकर उसका पालन करते हुए उसे साथ
लेकर जा रहे थे ॥ 17 ॥
एकदिन एकस्थाने नदी पार हैते।
उड़िया नाविक कुक्कुर ना चढ़ाय नौकाते ॥ 18 ॥
अनुवाद—एक दिन एक स्थानपर सभी यात्री
नौकाके द्वारा नदी पार कर रहे थे, किन्तु उड़िया-नाविकने
कुत्तेको अपनी नौकामें चढ़ानेसे मना कर दिया ॥ 18 ॥
कुक्कुर रहिला,—शिवानन्द दुःखी हैला।
दश पण कड़ि दिया कुक्कुरे पार कैला ॥ 19 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन यह देखकर बहुत
दुःखी हुए कि कुत्ता पार होनेसे रह जायेगा। तब
उन्होंने दस पण कौड़ी (आठ सौ कौड़ी) देकर कुत्तेको
पार करवाया ॥ 19 ॥
एकदिन शिवानन्दे घाटिते रहिला।
कुक्कुरके भात दिते सेवक पासरिला ॥ 20 ॥
अनुवाद—एकदिन श्रीशिवानन्द सेन शुल्क संग्रह
करनेवालेके साथ व्यस्त हो गये और उनका सेवक
कुत्तेको भात देना भूल गया ॥ 20 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'पासरिला'—भूल गया ॥ 20 ॥
रात्रे आसि' शिवानन्द भोजनेर काले।
'कुक्कुर पाञाछे भात?'—सेवके पुछिले ॥ 21 ॥
अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेन रात्रिके समय लौटे
और भोजन करने बैठे, तब उन्होंने अपने सेवकसे
पूछा,—'क्या कुत्तेको भी भोजन मिला है?' ॥ 21 ॥