श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1998, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ प्राक्तन-विक्षिप्त श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
प्राक्तन-प्राचीन
प्रादुर्भूत-आविर्भूत, अवतरित
प्रादेशिक वाक्य-प्रसङ्गत, स्थानीय वाक्य
प्रापक-प्राप्त करने या करानेवाला
प्रापञ्चिक-जगत् या प्रपञ्च-सम्बन्धी
प्राप्य-प्राप्त होने योग्य
प्रार्थित-प्रार्थना किया हुआ
प्रेमास्पद-प्रेमका स्थल
प्रेमोत्कर्ष-प्रेमका उत्कर्ष
ब
बाहुल्य-अधिकता
बाह्य अङ्ग-बाहरी अङ्ग
बिद्ध-छेदा हुआ, आहत
बृहत्-बड़ा
बोधगम्य-समझमें आने योग्य
ब्रह्मलय-ब्रह्ममें लय होना
ब्रह्मवेत्ता-ब्रह्मको जाननेवाला
ब्रह्मानन्द-ब्रह्मका आनन्द
ब्रह्मानुभूति-ब्रह्मकी अनुभूति
भ
भक्तानन्दायिनी-भक्तोंको आनन्द देनेवाली
भोक्तृत्वभाव-भोक्ता होनेका भाव
म
मत्सम्बन्धी-मेरे सम्बन्धी
मत्सरता-डाह, जलन, द्वेष
मथन-मथनेका भाव
मधुरिमा-माधुर्य
मन्वन्तर-ब्रह्माजीके दिनका चौदहवाँ भाग
मन्तव्य-विचार, मत
मर्मार्थ-सार
महत्-बड़ा
मायाच्छन्न-मायाके द्वारा आच्छन्न
मुकुलित-आधा विकसित
मुमुक्षु-मुक्तिकी इच्छा करनेवाला
मेधायुक्त-मेधावी
मोहान्ध-मोहसे अन्धा
म्लेच्छ-चारो वर्णोंसे भी नीच
य
यतिगण-संन्यासी लोग
याग-यज्ञ
यादृच्छिक-स्वतन्त्र, ऐच्छिक
युक्तियुक्त-उचित, युक्तिपूर्ण
युगपत्-एक ही समयमें, साथ-साथ
युगावतार-प्रत्येक युगमें लेनेवाले अवतार
योगमाया-भगवान्की परा शक्ति
योगस्थैर्य-योगकी स्थिरता
र
रक्तिम-लालिमायुक्त
रञ्जित-रंगा हुआ
रुक्ष-रूखा, नीरस
ल
लिङ्गशरीर-सूक्ष्म शरीर
लिप्सा-किसी वस्तुको पानेकी इच्छा
लुब्ध-ललचाया हुआ, लोभित
लोकपाल-लोकका पालन करनेवाला
लोकप्रवर्त्तन-लोगोंके कल्याणके लिये
व
वञ्चक-वञ्चना करनेवाला
वयस-उम्र
वर्चस्व-अधिकार
वर्णविशिष्ट-वर्णवाला
वर्णसङ्कर-भिन्न जातियोंके स्त्री-पुरुषसे उत्पन्न
वाक्-वाणी, बोलनेकी इन्द्रिय
वाचाल-अधिक बोलनेवाला
वागिन्द्रिय-जिह्वा
विक्षिप्त-पागल, उद्विग्न
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