श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1977, कुल 2549 में से
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एइ आज्ञाबले भक्तरे 22/60 | एइ 'शुद्धभक्ति'—इहा हैते 19/169 | एत सब छाड़ि' आर 22/90
एइ 'ऋण' आमि नारिब 18/153 | एइसब कृष्णभक्ति-रसे 19/180 | ए तिने सब छाड़ाय 24/99
एइ कृष्ण—व्रजे 'पूर्णतम' 20/400 | एइ सब साधनेर अति 22/18 | एबे यदि महाप्रभु शान्तिपुर 16/231
एइ घाटे अक्रूर वैकुण्ठ 18/136 | एइ सबे बिद्धा-त्याग 24/337 | ऐ
एइ चारि बाटोयार धुतुरा 18/165 | 'एइ स्थाने आछे धन' 20/132 | ऐश्वर्य कहिते स्फुरिल 21/31
एइ चारि सुकृति हय 24/91 | 'एक' अङ्ग साधे, केह 22/130 | ऐश्वर्यज्ञान-प्राधान्ये 19/194
एइ चारिर सेवा हय 22/122 | 'एक' अङ्गे सिद्धि पाइल 22/131 | ऐश्वर्यज्ञाने दुँहार मने भय 19/196
एइ चारि हैते चब्बिश 20/191 | एकइ डुम्बुर-वृक्षे लागे 15/172 | ऐश्वर्य देखिले निजसम्बन्ध 19/202
एइत परम-फल 'परम 19/164 | एक एक गुण शुनि' 23/65 | ऐ
एइ त' साधनभक्ति—दुइ 22/105 | एक एक गोप करे ये 21/20 | ऐछे पवित्र प्रेम-सेवा 15/84
एइ तिन धामेर हय 21/54 | एक एक वृक्षेरे तले 19/127 | ऐछे वेद-पुराण जीवे 20/129
एइ तिन लोके कृष्णेर 21/91 | एक कृष्णदेह हैते 21/23 | ऐछे मोहन-विद्या—ये 17/118
एइ तोमार वर हैते 23/118 | एक कृष्णनामे करे सर्वपाप 15/107 | ऐछे शास्त्र कहे,—कर्म 20/136
एइ दुइ 'अधम' नहे 19/71 | एक 'कृष्णलोक' हय 20/214 | क
एइ दुइ गुण व्यापे सब 19/216 | एकदिन द्वारकाते कृष्ण 21/59 | कदम्बेर एक वृक्षे फुटे 15/129
एइ दुइ नाम धरे व्रजेन्द्र 20/240 | एकदिन पथे व्याघ्र करियाछे 17/28 | कदर्धिया तुमि यत मारिला 24/245
एइ दुइ लक्षणे 'वस्तु' 20/354 | एक-दुइ-तिन-चारि-क्रमे 19/232 | कभु कुञ्जे रहे, कभु 18/44
एइ दोषे माया तार 22/24 | एक 'नामाभासे' तोमार 25/192 | कभु भक्तिरसशास्त्र करये 19/131
एइ नव प्रीत्यङ्कुर याँर 23/20 | एक-'नित्यमुक्त', एक- 22/10 | कभु शस्य खाञा पुनः 15/78
एइ पञ्च-मध्ये एक 24/188 | 'एकपाद विभूति', इहार 21/87 | कभु शून्य फल राखेन 15/75
एइ बड़ 'पाप',—सत्य 25/35 | एक बन्दी छाड़े यदि 20/6 | कभु स्वर्गे उठाय, कभु 20/118
एइ वाक्ये बिकाइनु ताँर 15/100 | एक-वपु बहु रूप यैछे 20/167 | करनख-चान्देर ठाट 21/128
एइ वेश दूर कर, याह 20/69 | 'एक' वाराणसी छिल 25/165 | कराँया-मात्र हाते, काँथा 19/129
एइ भूत्रा केने मोरे 20/23 | एक 'वैधी भक्ति' 22/105 | 'कर्म', 'ज्ञान', 'योग' आगे 18/196
एइमत कर्णपूर लिखे स्थाने 19/122 | एक भुक्ति कहे, भोग 24/28 | कर्म, तप, योग, ज्ञान 21/119
एइमत दशदिन प्रयागे रहिया 19/135 | 'एक शिला' आलिङ्गिया 18/16 | कलिक़ाले नामाभासे सुखे 25/30
एइमत ब्रह्माण्ड भरि' अनन्त 19/138 | 'एकषष्टि' अर्थ एबे 24/307 | कलिक़ाले संन्यासे 'संसार' 25/28
एइमत भक्तगण रहिला चारि 16/47 | एक संन्यासी आइला 17/106 | कलिते अवतार तैछे 20/350
एइमत मधुरे सब भाव 19/233 | एकादश स्कन्धे तार 22/68 | कलियुगे कृष्णनामे सेइ 20/341
एइत' महिमा—तोमार 18/126 | एका याइब, किवा सङ्गे 16/273 | 'कल्मष' घुचिले जीव 15/276
एइ ये तोमार अनन्त 21/26 | एत बलि' झाँप दिला 18/137 | कह,—ताँहा कैछे रहे 19/125
एइ रस आस्वाद नाहि 23/94 | एत बलि' तिन तत्त्व 25/106 | काढ़िते ना पारि माथा 15/149
एइरूप रतन, भक्तगणेर 21/103 | एत बलि' फल फेले 15/84 |
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