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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1934, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1934

[ 25/76-84 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
पाषण्डियोंका कार्य अथवा परिचय :-
जीवे 'विष्णु' बुद्धि करे—येइ ब्रह्म-रुद्र-सम।
नारायणे माने, तारे 'पाषण्डीते' गणन॥ 77 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, —“ 'विष्णु', 'विष्णु'! मैं तो एक छोटा-सा तुच्छ जीव हूँ। जीवको विष्णु मानना अपराधका लक्षण है। साधारण जीवको 'विष्णु' माननेकी बात तो छोड़ो, जो ब्रह्मा-रुद्रको भी श्रीनारायणके समान मानता है, वह 'पाखण्डी' कहलाता है॥ 76-77॥
शास्त्र-प्रमाण :-
वैष्णवतन्त्र-वाक्य और पाद्मोत्तर-खण्ड (23/12)में—
यस्तु नारायणं देवं ब्रह्मरुद्रादिदैवतैः।
समत्वेनैव वीक्षेत स पाषण्डी भवेद्ध्रुवम्॥ ”78॥
अनुवाद—जो ब्रह्मा-रुद्रादि देवताओंके साथ श्रीनारायणको 'समान' रूपमें देखते हैं, वे निश्चय ही 'पाखण्डी' हैं॥”78॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 18/116 संख्या देखें॥ 78॥
महाप्रभुमें प्रकाशानन्दका दृढ़ विश्वास और श्रद्धा :-
प्रकाशानन्द कहे,—“तुमि साक्षात् भगवान्।
तबु यदि कर ताँर 'दास'-अभिमान॥ 79 ॥
तबु पूज्य हओ तुमि आमा सबा हैते।
सर्वनाश हय, एइ तोमार निन्दाते॥ 80 ॥
अनुवाद—श्रीप्रकाशानन्द सरस्वतीने कहा, —“आप साक्षात् भगवान् हैं, परन्तु आप स्वयंमें भगवान्का 'दास' होनेका अभिमान कर रहे हैं। वैसा होनेपर भी आप हम सबके पूजनीय हैं, इसलिये आपकी निन्दा करनेसे मेरी पारमार्थिक सम्पत्तिका सर्वनाश हुआ है॥ 79-80॥
श्रीमद्भागवत (6/14/5)में—
मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः।
सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने॥ 81 ॥
अनुवाद—हे महामुने, करोड़ों-करोड़ों मुक्तों और सिद्धोंमेंसे नारायण-परायण प्रशान्तात्मा पुरुष अत्यन्त दुर्लभ है॥ 81 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 19/150 संख्या देखें॥ 81 ॥
महत् अथवा वैष्णवकी निन्दासे सर्वनाश :-
श्रीमद्भागवत (10/4/46)में—
आयुः श्रियं यशो धर्मं लोकानाशिष एव च।
हन्ति श्रेयांसि सर्वाणि पुंसो महदतिक्रमः॥ 82 ॥
अनुवाद—मनुष्यके द्वारा महान् व्यक्तिका अनादर करनेसे उसकी आयु, श्री (सम्पत्ति), यश, धर्म, लोक-परलोक और आशीर्वाद—ये सब श्रेष्ठ वस्तुएँ नाश हो जाती हैं॥ 82 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 15/270 संख्या देखें॥ 82 ॥
श्रीमद्भागवत (7/5/32)में—
नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाङ्घ्रिं
स्पृशत्यनर्थापगमो यदर्थः।
महीयसां पादरजोऽभिषेकं
निष्किञ्चनानां न वृणीत यावत्॥ 83 ॥
अनुवाद—जब तक मनुष्योंकी मति निष्किञ्चन भगवद्भक्तोंकी पदधूलिके द्वारा अभिषिक्त नहीं होती, तब तक वह अनर्थनाशक श्रीकृष्णचरणकमलोंका स्पर्श नहीं कर पाती॥ 83 ॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 22/53 संख्या देखें॥ 83 ॥
अहङ्कारका त्याग करके श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें प्रणामके फलसे शुद्ध भक्तिकी प्राप्ति :-
एबे तोमार पादाब्जे उपजिबे भक्ति।
तथि लागि' करि तोमार चरणे प्रणति॥ ”84॥
अनुवाद—अब आपके चरणकमलोंमें मेरी भक्ति उदित हो, इसी कारण मैं आपके चरणोंमें प्रणाम कर रहा हूँ॥”84॥
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