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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1925, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1925

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (transcription) दिया गया है:

पचीसवाँ अध्याय 25/12-20 ]
होकर (मायावादियोंपर कृपा करनेका) निवेदन करने
लगे॥ 12 ॥
भक्तोंकी इच्छाको पूर्ण करनेके लिये महाप्रभुकी
कृपा-अभिलाषा :-
भक्त-दुःख देखि' प्रभु मनेते चिन्तिल।
संन्यासीर मन फिराइते मन हइल ॥ 13 ॥
अनुवाद-भक्तोंके दुःखको देखकर महाप्रभुने
मन-ही-मन मायावादी संन्यासियोंके मनको परिवर्तित
करनेका निर्णय किया ॥ 13 ॥
महाराष्ट्र
हेनकाले विप्र आसि' करिल निमन्त्रण।
अनेक दैन्यादि करि' धरिया चरण ॥ 14 ॥
अनुवाद-उसी समय महाराष्ट्र
महाप्रभुके श्रीचरण पकड़कर बड़ी दीनतापूर्वक उनको
निमन्त्रण दिया ॥ 14 ॥
महाप्रभुके द्वारा निमन्त्रण स्वीकार :-
तबे महाप्रभु ताँर निमन्त्रण मानिला।
आर दिन मध्याह्न करि' ताँर घरे गेला ॥ 15 ॥
अनुवाद-तब महाप्रभुने उन ब्राह्मणके निमन्त्रणको
स्वीकार कर लिया और अगले दिन दोपहरका स्नान
और अन्यान्य नित्यकृत्यादि करके उन ब्राह्मणके घरपर
गये॥ 15 ॥
मायावादी संन्यासियोंका उद्धार-पहले आदिलीलाके
सातवें अध्यायमें वर्णित :-
ताँहा यैछे कैला प्रभु संन्यासी-निस्तार।
पञ्चतत्त्वाख्याने ताहा करियाछि विस्तार ॥ 16 ॥
अनुवाद-वहाँपर जाकर महाप्रभुने जिस प्रकार उन
संन्यासियोंका उद्धार किया, उसका मैंने पञ्चतत्त्वके
प्रसङ्ग (आदिलीला सातवें अध्यायमें) पहले ही विस्तृत
रूपसे वर्णन किया है ॥ 16 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला सातवें अध्यायमें पञ्चतत्त्वकी
व्याख्याके प्रसङ्गमें यह लीला विस्तृत रूपसे वर्णित हुई
है॥ 16॥
पुनरुक्ति भय :-
ग्रन्थ बाड़े, पुनरुक्ति हय त' कथन।
ताँहा ये ना लिखिलुँ, ताहा करिये लिखन ॥ 17 ॥
अनुवाद-पुनः उसका वर्णन करनेसे ग्रन्थका कलेवर
बढ़ जायेगा। वहाँपर मैंने जिस प्रसङ्गका वर्णन नहीं
किया, अब केवल उसीके विषयमें ही लिखूँगा ॥ 17 ॥
मायावादियोंकी कृपाप्राप्तिके दिनसे बहुतसे तार्किकोंका
महाप्रभुके साथ तर्क करनेके लिये आना :-
ये-दिवस प्रभु संन्यासीरे कृपा कैल।
से-दिवस हैते ग्रामे कोलाहल हैल ॥ 18 ॥
लोकेर संघट्ट आइसे प्रभुरे देखिते।
नाना शास्त्रे पण्डित आइसे शास्त्र विचारिते ॥ 19 ॥
अनुवाद-जिस दिन महाप्रभुने मायावादी संन्यासियोंपर
कृपा की, उसी दिनसे सम्पूर्ण वाराणसीमें सर्वत्र इसकी
चर्चा होने लगी। महाप्रभुके दर्शनके लिये लोगोंकी भीड़
आने लगी। अनेकानेक शास्त्रोंको जाननेवाले पण्डित
भी महाप्रभुसे शास्त्रोंपर विचार करनेके लिये आने
लगे॥ 18-19 ॥
शुद्धभक्तिसिद्धान्तपूर्ण अकाट्य-युक्तिके बलसे महाप्रभुके
द्वारा सभीके कुतर्कका खण्डन :-
सर्वशास्त्र खण्डि' प्रभु 'भक्ति' करे सार।
सयुक्तिक वाक्ये मन फिराय सबार ॥ 20 ॥
अनुवाद-शास्त्रोंकी भुक्ति-मुक्ति आदिकी प्रधानता
दिखानेवाले सभी विचारोंका खण्डन करके महाप्रभु
'भक्ति'को ही सभी शास्त्रोंके सारके रूपमें स्थापित
करते। अत्यन्त सुन्दर युक्तियोंके द्वारा वे सभीके मनका
परिवर्तन कर देते ॥ 20 ॥
। 479