श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1918, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 24/331-339 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
निवेदन, (25) देवताको पीठ दिखाकर बैठना,
(26) दूसरेका अभिवादन, (27) गुरुके आनेपर उनका
स्तव नहीं करके बैठे रहना, (28) आत्म-प्रशंसा,
(29) देवनिन्दा, (30) अन्य व्यक्तिके प्रति निर्दयता,
(31) उत्सव नहीं मनाना, (32) कलह करना।
'पुष्प-लक्षण'—हःभःविः सातवाँ विभाग देखें। 'धूपादि
लक्षण'—हःभःविः आठवाँ विभाग देखें। 'जप, स्तुति,
परिक्रमा, दण्डवत् और वन्दना'—हःभःविः आठवाँ
विभाग देखें।
'पुरश्चरण-विधि'—मध्यलीला 15/108 संख्याका
अनुभाष्य देखें।
'कृष्णप्रसाद भोजन'—
“संभोज्य भोजनं कुर्यादन्यथा नरकं व्रजेत्। अपूज्य भोजनं
कुर्वन् नरकाणि व्रजेन्नरः ॥”
[अर्थात् “श्रीहरिको भोजन कराके स्वयं भोजन
करना, अन्यथा नरकमें जाना पड़ेगा। श्रीहरिकी पूजा
नहीं करके भोजन करनेसे मनुष्यको नरकोंकी प्राप्ति
होती है।”]
'अनिवेदित-त्याग'—
“अनिवेद्य तु भुञ्जानः प्रायश्चित्ती भवेन्नरः। तस्मात् सर्वं
निवेद्यैव विष्णोर्भुञ्जीत सर्वदा॥”
[अर्थात् “अनिवेदित द्रव्य उपभोग करनेसे मनुष्यको
प्रायश्चित करना पड़ता है, इसलिये सदैव सभी द्रव्य
श्रीविष्णुको निवेदन करके भोजन करना चाहिये।”]
हःभःविः 9म विः 108 संख्या देखें। 'वैष्णवनिन्दा-वर्जन'—
मध्यलीला 15/261 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 331-333 ॥
साधुलक्षण, साधुसङ्ग, साधुसेवन।
असत्सङ्ग-त्याग, श्रीभागवत-श्रवण ॥ 334 ॥
अनुवाद—अर्थ स्पष्ट है ॥ 334 ॥
दिनकृत्य, पक्षकृत्य, एकादश्यादि-विवरण।
मासकृत्य, जन्माष्टमीयादि-विधि-विचारण ॥ 335 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 335 ॥
अनुभाष्य—'दिनकृत्य'—दिवसके कालोचित कृत्यसमूह।
'पक्षकृत्य'—तिथिमें, विशेषतः एकादशी आदिमें अनुष्ठान
योग्य कृत्यसमूह। 'मासकृत्य'—बारह महीनोंके कृत्यसमूह।
'एकादशी आदिका विवरण'—हःभःविः 12वाँ विः देखें।
'जन्माष्टमी-आदि-विधि-विचारण'—हःभःविः 12वाँ विः
देखें ॥ 335 ॥
एकादशी, जन्माष्टमी, वामनद्वादशी।
श्रीरामनवमी, आर नृसिंहचतुर्दशी ॥ 336 ॥
एइ सबे बिद्धा-त्याग, अबिद्धा-करण।
अकरणे दोष, कैले भक्तिर लभन ॥ 337 ॥
अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 336-337 ॥
अनुभाष्य—एकादशीमें अरुणोदय-बिद्धा त्याग और
अन्य (जन्माष्टमी, वामनद्वादशी, श्रीरामनवमी और
नृसिंहचतुर्दशी) व्रतोंमें सूर्योदय-बिद्धा त्याग करके अबिद्ध
(शुद्ध) व्रत ही पालनीय है। बिद्ध-व्रतका पालन
करनेसे 'दोष' और अबिद्ध व्रत-पालनसे ही 'भक्ति'
होती है। विशेष रूपसे जाननेके लिये हःभःविः 12वाँ
और 13वाँ विः देखें ॥ 337 ॥
महाप्रभुके द्वारा सात्वत पुराणको 'प्रमाण'
कहकर स्वीकार करना :-
सर्वत्र प्रमाण दिबे पुराण-वचन।
श्रीमूर्त्ति-विष्णुमन्दिरकरण-लक्षण ॥ 338 ॥
अनुवाद—सर्वत्र पुराणके वचनोंके द्वारा प्रमाण
प्रस्तुत करना। श्रीमूर्त्ति और विष्णुमन्दिर बनानेके लक्षण
बतलाना ॥ 338 ॥
हरिभक्तिविलासमें सामान्य और वैष्णव
सदाचारके वर्णनकी आज्ञा :-
'सामान्य' सदाचार, आर 'वैष्णव'-आचार।
कर्त्तव्याकर्त्तव्य 'स्मार्त्त' व्यवहार ॥ 339 ॥
अनुवाद—उस ग्रन्थमें 'सामान्य' सदाचार और
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