सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1906, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1906

[ 24/316-324 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य—
[यद् युष्माभिः पृष्टं—‘धर्मः कं शरणं गतः?’ इति, तदिदमेव
बुध्यस्वेत्याह—] धर्मज्ञानादिभिः (षड्भिः ऐश्वर्यैः) सह कृष्णे
स्वधाम उपगते (प्रकटलीलां समाप्य अप्रकट-लीलां प्राप्ते
सति) अधुना (सम्प्रति) कलौ (कलियुगे) नष्टदृशां
(सद्धर्म-विष्णुभक्तितत्त्वज्ञानरहितानां हिताय) एषः पुराणार्कः
(सूर्य इव उद्धर्मशार्वरहरः श्रीमद्भागवत-ग्रन्थः) उदितः (आविर्भूतः,
प्रकटितः इत्यर्थः) ।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 316 ॥
श्रीचैतन्यका अनुसरण करते हुए शुद्ध चिद्धर्मके स्फुरित
होनेसे अप्राकृत श्रीकृष्ण-सेवोन्मत्तके लिये ही भागवतके
अर्थको जाननेमें योग्यताका निर्देश :-
एइ मत कहिलुँ एक श्लोकेर व्याख्यान।
वातुलेर प्रलाप करि' के करे प्रमाण ? ॥ 317 ॥
आमा-हेन येबा केह 'वातुल' हय।
एइ दृष्टे भागवतेर अर्थ जानय ॥"318 ॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने भागवतके केवल एक
श्लोककी ही व्याख्या की है। किन्तु पागलका प्रलाप
समझकर कौन इसे प्रमाण मानेगा ? मेरे जैसा यदि कोई
'पागल' हो, तभी वह इस दृष्टिकोणसे भागवतके
अर्थोंको जान सकता है॥"317-318 ॥
महाप्रभुसे श्रीसनातनके द्वारा 'वैष्णव-स्मृति'के सम्बन्धमें
दीनतापूर्वक जिज्ञासा और श्रीमुखसे उपदेशको श्रवण
करनेकी इच्छा :-
पुनः सनातन कहे युड़ि' दुइ करे।
“प्रभु, आज्ञा दिला 'वैष्णवस्मृति' करिबारे ॥ 319 ॥
मुञि—नीच-जाति, किछु ना जानि विचार।
मो-हैते कैछे हय स्मृति-परचार ॥ 320 ॥
अनुवाद—दोनों हाथ जोड़कर श्रीसनातन गोस्वामीने
तब महाप्रभुसे कहा, — “हे प्रभो! मुझे आपने
'वैष्णवस्मृति'की रचना करनेके लिये आज्ञा दी थी। मैं
नीच-जातिका हूँ और वैष्णवाचारके विषयमें कुछ भी
नहीं जानता हूँ। तब मैं कैसे वैष्णवाचारके नियमोंके
ग्रन्थको लिख सकता हूँ? ॥ 319-320 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- 'नीचजाति' -श्रीसनातनने कहा,
'मैं म्लेच्छोंके संसर्गसे पतित ब्राह्मणजाति हूँ ॥'320 ॥
अनुभाष्य— 'वैष्णवस्मृति' - वैष्णवोंके लौकिक
आचार-विषयक व्यवहार-शास्त्र 'श्रीहरिभक्तिविलास'-ग्रन्थ।
जाति तीन प्रकारकी हैं—शौक्र (जन्मके अनुसार),
सावित्र (उपनयन संस्कारके अनुसार) और दैक्ष
(दीक्षाके अनुसार)। यद्यपि श्रीसनातन पवित्र कर्णाट
ब्राह्मणकुलमें आविर्भूत हुए थे, तथापि लौकिक दृष्टिसे
म्लेच्छोंकी दास्यवृत्ति नीचजातिके होनेका सङ्केतमात्र है।
वर्तमानकालमें केवल मातृ-गर्भसे जन्म ही 'जाति'का
परिचय है, वास्तवमें यह अनभिज्ञताका ही परिचायक
मात्र है ॥ 319-320 ॥
सूत्र करि' दिशा यदि करह उपदेश।
आपने करह यदि हृदये प्रवेश ॥ 321 ॥
तबे तार दिशा स्फुरे मो-नीचेर हृदये।
ईश्वर तुमि, -ये कराह, सेइ सिद्ध हये ॥ "322 ॥
अनुवाद-आप कृपा करके सूत्ररूपमें वैष्णवस्मृतिकी
प्रणालीका उपदेश प्रदान करें। आप स्वयं मेरे हृदयमें
प्रवेश करें। आपके हृदयमें आनेपर और निर्देश प्रदान
करनेपर मुझ नीचके हृदयमें इस ग्रन्थकी स्फूर्ति हो
सकती है। आप ईश्वर हैं, आप जैसा करायेंगे, वही
होगा ॥"321-322 ॥
अनुभाष्य— 'दिशा' - प्रणाली ॥ 322 ॥
महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनको वरदान :-
प्रभु कहे, – “ये करिते करिबा तुमि मन।
कृष्ण सेइ सेइ तोमा कराबे स्फुरण ॥ 323 ॥
महाप्रभुके द्वारा वैष्णव-स्मृतिका सूत्र-वर्णन और
'हरिभक्तिविलास'की नींवकी संस्थापना :-
तथापि एइ सूत्रेर शुन दिग्दरशन।
सकारण लिखि आदौ गुरु-आश्रयण ॥ 324 ॥
460 ।