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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 19

पद्यावली, (५) गीतगोविन्द, (६) गोपालचम्पू, (७) गोविन्द-लीलामृत, (८) जगन्नाथवल्लभ,
(९) वैष्णवतोषणी, (१०) स्तवमाला, (११) स्तवावली, (१२) पद्यावली, (१३) विदग्धमाधव,
(१४) बृहद्भागवतामृत, (१५) भक्तिरसामृतसिन्धु, (१६) भगवत्सन्दर्भ, (१७) लघुभागवतामृत,
(१८) ललितमाधव-नाटक, (१९) सर्वसम्वादिनी, (२०) दानकेलिकौमुदी, (२१) नाटकचन्द्रिका,
(२२) हरिभक्तिविलास।
अन्य-ग्रन्थ—
(१) अध्यात्म-रामायण, (२) अभिधानसमूह, (३) अलङ्कारशास्त्र, (४) एकादशीतत्त्व,
(५) उद्वाहतत्त्व, (६) काव्यप्रकाश, (७) दिग्विजयी-स्तव, (८) नैषध, (९) प्राचीनकृत श्लोक,
(१०) पाणिनि, (११) बङ्गदेशीय विप्र-कृत श्लोक, (१२) विश्वप्रकाश, (१३) बाल्मीकिकृत
रामायण, (१४) भरतमुनि-वाक्य, (१५) सामुद्रिक-शास्त्र, (१६) मलमासतत्त्व, (१७) मुनिवाक्य,
(१८) योगवाशिष्ठ, (१९) रघुवंश, (२०) शकुन्तला, (२१) शङ्कराचार्यकृत शारीरक भाष्य और
(२२) भारवी।
“ग्रन्थका विभाग”
यह ग्रन्थ तीन भागोंमें विभक्त है—आदिलीला, मध्यलीला और अन्त्यलीला। आदिलीलामें
सत्रह अध्यायों, मध्यलीलामें पच्चीस अध्यायों और अन्त्यलीलामें बीस अध्यायोंसे अन्तर्विभाग
रचित हुआ है। तीनों लीलाओंके विभिन्न अध्यायोंमें लिखित विषयसमूहका वर्णन सूत्र-आकारमें
प्रत्येक लीलाके अन्तिम अध्यायमें अर्थात् आदिलीलाके सतरहवें अध्यायमें, मध्यलीलाके
पच्चीसवें अध्यायमें और अन्त्यलीलाके बीसवें अध्यायमें लिपिबद्ध हुआ है। इसके अतिरिक्त
मध्यलीलाके पहले अध्यायमें श्रीगौरसुन्दरके नीलाचलमें अवस्थान करते समय की गयी सभी
लीलाओंका धारावाहिक अनुवाद लिखकर मध्य और अन्त्यलीलाके विभिन्न अध्यायोंके
अन्तर्गत लीला वर्णनका एक संयोजन परिदृष्ट होता है। इसमें अध्याय-गत संख्याका उल्लेख
नहीं रहनेपर भी लीलासमूहका सूत्ररूपमें वर्णन है। इस प्रकार अनुवाद और सूत्र-वर्णन रहनेसे
ग्रन्थके बीचमें परवर्तीकालमें दूसरोंके द्वारा प्रक्षिप्त अर्थात् बादमें जोड़कर लिखे गये शब्दोंसे
ग्रन्थकारके अपने ग्रन्थकी रक्षा हुई है।
“आदिलीलाका विवरण”
आदिलीलाके प्रथम चार अध्यायोंमें श्रीचैतन्यदेव-तत्त्व, पाँचवें अध्यायमें श्रीनित्यानन्द-तत्त्व
और छठे अध्यायमें श्रीअद्वैत-तत्त्व सूचित हुआ है। सातवें अध्यायमें महाप्रभुका निजतत्त्व,
प्रकाशतत्त्व श्रीनित्यानन्द, अवतार-तत्त्व श्रीअद्वैत, शक्तितत्त्व श्रीगदाधरादि तथा भक्ततत्त्व
श्रीवासादिका तत्त्व-सम्मिलन वर्णित हुआ है। प्रथम चार अध्यायोंके पहलेमें श्रीचैतन्यका तत्त्व
साधारण रूपसे, दूसरेमें विशेष रूपसे, तीसरेमें प्रपञ्चमें अवतरणके बाह्य-उद्देश्य और चौथेमें
भूमिका | xi