श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1899, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौबीसवाँ अध्याय 24/266-275 ]
नारद कहे, - “व्याध, एइ ना हय आश्चर्य।
हरिभक्त्ये हिंसा-शून्य हय साधुवर्य ॥” 266 ॥
अनुवाद—श्रीनारदने कहा, - “हे शिकारी, तुम्हारा
ऐसा करना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। हरिभक्तिके
प्रभावसे व्यक्ति हिंसारहित होकर सर्वश्रेष्ठ साधु बन
जाता है ॥" 266 ॥
स्कन्दवचन :-
एते न ह्यद्भुता व्याध तवाहिंसादयो गुणाः।
हरिभक्तौ प्रवृत्ता ये न ते स्युः परतापिनः ॥ 267 ॥
अनुवाद—हे व्याध, तुममें जो अहिंसादि गुण उत्पन्न
हुए हैं, वह अद्भुत नहीं है, क्योंकि, जो हरिभक्तिमें
प्रवृत्त होता है, वह दूसरोंको कष्ट देनेवाला नहीं
होता ॥ 267 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 22/143 संख्या देखें ॥ 267 ॥
तबे सेइ व्याध दोंहारे अङ्गने आनिल।
कुशासन आनि' दोंहारे भक्त्ये बसाइल ॥ 268 ॥
अनुवाद—तब वह शिकारी उन दोनोंको अपने
आँगनमें ले आया और उसने कुशासन लाकर उन
दोनोंको भक्तिपूर्वक बैठाया ॥ 268 ॥
जल आनि' भक्त्ये दोंहार पाद प्रक्षालिल।
सेइ जल स्त्री-पुरुषे पिया शिरे लइल ॥ 269 ॥
अनुवाद—शिकारीने जल लाकर भक्तिपूर्वक उन
दोनोंके चरणोंका अभिषेक किया। तब शिकारी और
उसकी पत्नी, दोनोंने उस जलका पान किया और उसे
अपने सिरपर भी छिड़का ॥ 269 ॥
कम्प-पुलकाश्रु हैल कृष्णनाम गाञा।
ऊर्द्धबाहु नृत्य करे वस्त्र उड़ाञा ॥ 270 ॥
अनुवाद—जब शिकारी गुरुदेवके सामने श्रीकृष्णनामका
कीर्तन करने लगा, तब उसके शरीरमें कम्प-पुलक-अश्रु
आदि सात्त्विक विकार उत्पन्न हो गये। वह भावावेशमें
गान करते हुए दोनों हाथोंको उठाकर और कपड़ेको
हाथोंसे उड़ाते हुए नृत्य करने लगा ॥ 270 ॥
देखिया व्याधेर प्रेम पर्वत-महामुनि।
नारदेरे कहे,-“तुमि हओ स्पर्शमणि ॥” 271 ॥
अनुवाद—शिकारीके प्रेमको देखकर महामुनि
श्रीपर्वतने श्रीनारदसे कहा, - “आप स्पर्शमणि हैं॥” 271 ॥
स्कन्दवचन :-
“अहो धन्योऽसि देवर्षे कृपया यस्य तत्क्षणात्।
नीचोऽप्युत्पुलको लेभे लुब्धको रतिमच्युते ॥ 272 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 272 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे देवर्षे! आप धन्य हैं।
आपकी कृपासे नीच लुब्धक अर्थात् शिकारीने भी
पुलकित होकर श्रीकृष्णमें रति प्राप्त की है ॥ 272 ॥
अनुभाष्य-
हे देवर्षे (नारद,) अहो, (विस्मये, त्वं) धन्यः असि, यस्य
(तव) कृपया नीचः (नीचवृत्तिः) लुब्धकः (व्याधः) अपि
उत्पुलकः (रोमाञ्चितदेहः सन्) अच्युते (भगवति विष्णौ) रतिं
लेभे (प्राप)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 272 ॥
परम वैष्णवश्रेष्ठ श्रीनारदकी कृपासे भक्त-शिकारीके
योग-क्षेमका समाधान :-
नारद कहे,-“वैष्णव, तोमार अन्न किछु आय?”
व्याध कहे, -“यारे पाठिओ, सेइ दिया याय ॥ 273 ॥
एत अन्न ना पाठिओ, किछु कार्य नाइ।
सबे दुइजनार योग्य भक्ष्यमात्र चाइ ॥” 274 ॥
नारद कहे, - “ऐछे रह, तुमि भाग्यवान् ।”
एत बलि' दुइजन हइला अन्तर्धान ॥ 275 ॥
अनुवाद—श्रीनारदने शिकारीसे पूछा, - “हे वैष्णव,
तुम्हारे पास कुछ भोजनकी सामग्री आती है तो?'
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