श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1896, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 24/231-242 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
क्रुद्ध हञा व्याध ताँरे गालि दिते चाय।
नारद-प्रभावे मुखे गालि नाहि आय ॥ 231 ॥
अनुवाद-पशुओंको वहाँसे भागते देखकर शिकारीको
बहुत क्रोध आया और वह श्रीनारदको गाली देना
चाहता था, किन्तु श्रीनारदके प्रभावसे उसके मुखसे
कोई गाली निकली ही नहीं ॥ 231 ॥
“गोसाञि, प्रयाण-पथ छाड़ि' केने आइला।
तोमा देखि' मोर लक्ष्य मृग पलाइला ॥" 232 ॥
अनुवाद-शिकारीने कहा,-“हे गोसाईं ! आप वनमें
चलनेवाले मार्गको छोड़कर मेरी ओर क्यों आये हैं?
आपको देखकर मेरे शिकार भाग गये ॥" 232 ॥
अनुभाष्य-'प्रयाण-पथ'-पाठान्तरमें 'प्रमाण-पथ'; जिस
निर्दिष्ट पथसे पथिक जाते हैं अर्थात् प्रचलित पथ ॥ 232 ॥
नारद कहे, - “पथ भूलि' आइलाङ पूछिते।
मने एक संशय हय, ताहा खण्डाइते ॥ 233 ॥
पथे ये शूकर-मृग, जानि तोमार हय।”
व्याध कहे, - “येइ कह, सेइ त' निश्चय ॥" 234 ॥
अनुवाद-श्रीनारदने कहा, - "मैं अपने मार्गको छोड़कर
तुमसे कुछ पूछनेके लिये ही आया हूँ। मेरे मनमें एक
संशय है; मैं उसे दूर करना चाहता हूँ। मुझे लगता
है कि मार्गमें पड़े हुए सूअर और हिरणादि तुम्हारे हैं।”
शिकारीने कहा, - “आप जो कह रहे हैं, वैसा ही
है॥" 233-234 ॥
नारद कहे,-“यदि जीवे मार' तुमि बाण।
अर्द्ध-मारा कर केने, ना लओ पराण ?" 235 ॥
अनुवाद-श्रीनारदने कहा, - "यदि तुम किसी जीवको
बाण मारते हो तो उसके प्राण ही क्यों नहीं ले लेते?
उसे अधमरा क्यों करते हो ?" 235 ॥
व्याध कहे,-“शुन गोसाञि, 'मृगारि' मोर नाम।
पितार शिक्षाते आमि करि ऐछे काम ॥ 236 ॥
अर्द्ध-मारा जीव यदि धड्फड़ करे।
तबे त' आनन्द मोर बाड़ये अन्तरे ॥" 237 ॥
अनुवाद-शिकारीने कहा, - 'हे गोसाईं, सुनो! मेरा
नाम 'मृगारि' है और मैं अपने पिताकी शिक्षाके
अनुसार ही ऐसा कार्य करता हूँ। अधमरा जीव जब
छटपटाता है, तब मुझे बहुत आनन्द होता है ॥" 236-237 ॥
नारद कहे,-"एकवस्तु मागि तोमार स्थाने।"
व्याध कहे,-“मृगादि लह, येइ तोमार मने ॥ 238 ॥
मृगछाल चाह यदि, आइस मोर घरे।
येइ चाह, ताहा दिब मृगव्याघ्राम्बरे ॥" 239 ॥
अनुवाद-श्रीनारदने कहा, - "मैं तुमसे एक वस्तु
माँगना चाहता हूँ।" शिकारीने कहा, - "हिरणादि कोई भी
पशु लेनेकी आपकी इच्छा हो, आप ले लो। यदि आप
हिरणकी छाल चाहते हैं, तब फिर आप मेरे घर
आइये। हिरणकी छाल, बाघकी छाल-जो कुछ भी
आप चाहेंगे, मैं दे दूँगा ॥" 238-239 ॥
नारद कहे, - “इहा आमि किछु नाहि चाहि।
आर एक वस्तु आमि मागि तोमा-ठाञि ॥ 240 ॥
कालि हैते तुमि येइ मृगादि मारिबा।
प्रथमे मारिबा, अर्द्ध-मारा ना करिबा ॥" 241 ॥
अनुवाद-श्रीनारदने कहा, - "मुझे यह सब कुछ
नहीं चाहिये। मैं तो तुमसे कुछ और माँगता हूँ। कलसे
तुम जिस हिरणादिको मारोगे, उसे पहली बारमें ही पूरी
तरहसे मार देना, उसे अधमरा मत करना ॥" 240-241 ॥
व्याध कहे,-“किवा दान मागिला आमारे।
अर्द्ध मारिले किवा हय, ताहा कह मोरे ॥" 242 ॥
अनुवाद-शिकारीने कहा, - "आपने मुझसे यह
कैसा दान माँगा है? आधा मारनेसे क्या होता है, मुझे
इस विषयमें बतलाइये ॥" 242 ॥
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