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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 189

चौथा अध्याय
चौथे अध्यायका कथासार—इस चौथे अध्यायमें श्रीकृष्णदास कविराज यह दृढ़तापूर्वक कह
रहे हैं कि तीन गूढ़ प्रयोजन-सिद्धिके लिये श्रीचैतन्य महाप्रभु अवतीर्ण हुए।
(प्रथम प्रयोजन)—राधिका मेरे प्रेमकी आश्रय है और मैं उस प्रेमका विषय होनेके कारण
आश्रयजातीय सुखका अनुभव करनेमें असमर्थ हूँ। इसलिये मैं आश्रयस्वरूप राधिकाके भावोंका
अवलम्बनकर उसका आस्वादन करूँगा।
(द्वितीय प्रयोजन)—श्रीमती राधिका मेरी जिस माधुरीका आस्वादन करती है, वह
जगत्-आकर्षक होनेपर भी मैं उसका आस्वादन नहीं कर पाता हूँ; इसलिये राधिकाके भावों
और अङ्गकान्तिको ग्रहण किये बिना मेरा यह प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा।
(तृतीय प्रयोजन)—श्रीराधिकाके सङ्गमें मुझे जो सुख मिलता है, उसकी अपेक्षा अधिक सुख
राधिकाको मेरे सङ्गसे मिलता है। इसलिये मुझमें कोई एक ऐसा अपूर्व रस है, जिसका भोग
करके राधिकाको मुझसे अधिक सुख प्राप्त होता है। मेरे लिये विजातीय भावसे इस सुखको
अनुभव करना सम्भव नहीं है। राधिकाके भाव और कान्तिको अङ्गीकार करके राधिकाके
स्वजातीय भावोंका आस्वादन कर पाऊँगा।
इन तीन गूढ़ इच्छाओंको पूर्ण करनेके लिये श्रीचैतन्य महाप्रभु अवतीर्ण हुए। युगधर्मकी
स्थापना और श्रीअद्वैतचन्द्रादि भक्तोंकी आराधनाको स्वीकार करना श्रीचैतन्य महाप्रभुके
अवतारका केवल बाह्य कारण है। श्रीस्वरूप गोस्वामी श्रीचैतन्य महाप्रभुके अन्तरङ्ग भक्तोंमें
प्रधान हैं; उनके कड़चाके श्लोकोंसे यह गूढ़ तत्त्व प्राप्त होता है। श्रीरूपगोस्वामीके श्लोक द्वारा
भी इस सिद्धान्तकी दृढ़ता स्थापित हुई है। इस अध्यायमें काम और प्रेमके तत्त्वका भेद
दिखलाकर श्रीकृष्णप्रीतिकी कामनाको कामतत्त्वसे पृथक् किया गया है। (अमृतप्रवाह भाष्य)
श्रीगौरकृपासे श्रीकृष्णस्वरूपका निर्णय :—
श्रीचैतन्यप्रसादेन तद्रूपस्य विनिर्णयम्।
बालोऽपि कुरुते शास्त्रं दृष्ट्वा व्रजविलासिनः ॥ १॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ १॥
अमृतप्रवाह भाष्य—एक मूर्ख व्यक्ति भी श्रीचैतन्य महाप्रभुकी कृपासे शास्त्रोंको देखकर
व्रजविलासी श्रीकृष्णके तत्त्वस्वरूपका निरूपण करनेमें समर्थ हो जाता है॥ १॥
अनुभाष्य—बालः (अर्भकः) अपि श्रीचैतन्यप्रसादेन (गौरकृपया) शास्त्रं दृष्ट्वा व्रजविलासिनः (ब्रजेन्द्रनन्दनस्य)
तद्रूपस्य (राधाकृष्णाभिन्नगौररूपस्य) विनिर्णयं (तत्त्वनिर्देशं) कुरुते।
श्लोक-भावानुवाद—एक बालक भी श्रीगौरसुन्दरकी कृपासे शास्त्रोंको देखकर व्रजेन्द्रनन्दन
श्रीकृष्णके अर्थात् श्रीराधा-कृष्णसे अभिन्न श्रीगौरसुन्दररूपके तत्त्वका निरूपण कर सकता
है॥ १॥

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