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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1868, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1868

[ 24/85-89 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
श्रीमद्भागवत (2/3/10)में—
अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः।
तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥ 85॥
अनुवाद—पहले कोई 'अकाम' अर्थात् सर्वकामनाओंसे
रहित हो अथवा 'सर्वकाम' अर्थात् सब प्रकारकी
कामनाओंसे युक्त हो अथवा मोक्षकी कामना करनेवाला
ही क्यों न हो, उदार-बुद्धि होने मात्रसे ही मनुष्य तीव्र
शुद्धभक्तियोगसे परमपुरुष श्रीकृष्णका भजन करेंगे॥ 85॥
अनुभाष्य—मध्यलीला 22/36 संख्या देखें ॥ 85 ॥
'उदारधी' शब्दका अर्थ :—
बुद्धिमान्—अर्थे—यदि विचारज्ञ हय।
निज-काम लागिह तबे कृष्णेरे भजय ॥ 86 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 86 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—इस श्लोकमें यदि कोई उदारधी
अर्थात् बुद्धिमान् अर्थात् विचारवान् हो, तो वह
कामना-वासनाके रहनेपर भी श्रीकृष्णका ही भजन
करेगा ॥ 86 ॥
सब प्रकारके साधन ही भक्ति-सापेक्ष,
भक्ति ही केवल निरपेक्ष :—
भक्ति बिना कोन साधन दिते नारे फल।
सब फल देय भक्ति स्वतन्त्र प्रबल ॥ 87 ॥
अनुवाद—भक्तिके बिना कोई भी साधन फल प्रदान
नहीं कर सकता, किन्तु भक्ति अन्यान्य साधनोंकी
अपेक्षासे रहित स्वतन्त्र और बहुत अधिक बलशाली
है॥ 87 ॥
भक्तिके आश्रयके बिना अन्य साधन, सभी निष्फल :—
अजागलस्तन-न्याय अन्य साधन।
अतएव हरि भजे बुद्धिमान् जन ॥ 88 ॥
अनुवाद—जिस प्रकार बकरेके गलेके पास लटकते
स्तन (मांसके पिण्ड) दूध देनेमें असमर्थ होते हैं, उसी
प्रकार भक्तिके अतिरिक्त अन्य समस्त साधन भी किसी
फलको प्रदान करनेमें समर्थ नहीं हैं। इसलिये बुद्धिमान
व्यक्ति भगवान् श्रीहरिका ही भजन करते हैं ॥ 88 ॥
अनुभाष्य—भक्तिके अतिरिक्त अन्य प्रकारके साधन
पूर्णतया निष्फल हैं, वे कभी भी फल प्रदान नहीं कर
सकते। क्योंकि बकरेके गलेमें लटके हुए स्तन जिस
प्रकार दूध नहीं दे सकते, केवलमात्र अनभिज्ञ लोगोंके
झूठे भ्रमका ही विषय होते हैं, उसी प्रकार भक्तिके
अतिरिक्त ज्ञान और कर्मके साधनका कोई फल नहीं
होता॥ 88 ॥
भोगकामी और मोक्षकामीके भेदसे चार प्रकारके अनर्थयुक्त
सुकृतिवान् लोग; वैसा होनेपर भी ये चार प्रकारकी
कामनाएँ निष्काम भक्तिका कारण नहीं :—
श्रीमद्भगवद्गीता (7/16)में—
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्त्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥ 89 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 89 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे अर्जुन! आर्त्त, जिज्ञासु,
अर्थार्थी और ज्ञानी—ये चार प्रकारके लोग भक्ति-
उन्मुखी सुकृतिवान् होनेपर, उन-उन कामनाओंका
परित्याग करके मेरा भजन करते हैं ॥ 89 ॥
अनुभाष्य—
हे अर्जुन, हे भरतर्षभ, सुकृतिनः (वर्णाश्रमाचारलक्षण-धर्मपराः)
जनाः मां भजन्ते; ते च चतुर्विधाः—आर्त्तः (क्लिष्टः आपद्ग्रस्तः—
गजेन्द्रादिः), जिज्ञासुः (आत्मस्वरूपज्ञानेच्छुः—शौनकादिः), अर्थार्थी
(सुखसम्पदिच्छुः ध्रुवादि,—एते सकामाः), ज्ञानी (लब्ध-बोधः—
शुकादिः, अयं तु निष्कामः) च।
श्लोक-भावानुवाद—हे अर्जुन, हे भरतर्षभ,
सुकृतिवान् अर्थात् वर्णाश्रम-धर्मपरायण लोग मेरा भजन
करते हैं; वे चार प्रकारके होते हैं—आर्त्ति (दुःखी या
विपदाग्रस्त—गजेन्द्रादि), जिज्ञासु (आत्मस्वरूपको जाननेके
इच्छुक—शौनकादि), अर्थार्थी (सुख-सम्पत्तिके इच्छुक—
ध्रुवादि) और ज्ञानी (ज्ञान-प्राप्त—शुकदेवादि, ये निष्काम
होते हैं) ॥ 89 ॥
422 ।