श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1866, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 24/70-79 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य-आदिलीला 2/11 संख्या देखें ॥ 70 ॥
श्रीकृष्ण ही स्वयं भगवान् और त्रिकालसत्य वस्तु :-
सेइ अद्वयतत्त्व कृष्ण-स्वयं भगवान्।
तिनकाले सत्य तिँहो-शास्त्र-प्रमाण ॥ 71 ॥
अनुवाद-वे अद्वय-तत्त्व श्रीकृष्ण स्वयं भगवान्
हैं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान-इन तीनों कालोंमें
सत्य हैं, इस विषयमें शास्त्र ही प्रमाण है ॥ 71 ॥
सृष्टिसे पहले और बादमें
श्रीकृष्णका नित्य अधिष्ठान :-
श्रीमद्भागवत (2/9/32)में-
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत् सदसत्परम्।
पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत् सोऽस्म्यहम् ॥ 72 ॥
अनुवाद-इस जगत्की सृष्टिके पूर्व केवल मैं ही
था। सत्, असत् और अनिर्वचनीय निर्विशेष ब्रह्म तक
कुछ भी मुझसे पृथक् रूपसे नहीं था। सृष्टि होनेके
बाद इस सम्पूर्ण-स्वरूपमें मैं ही हूँ और सृष्टिकी प्रलय
होनेके बाद भी एकमात्र मैं ही अवशिष्ट रहूँगा ॥ 72 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 1/53 संख्या देखें ॥ 72 ॥
आत्मा-शब्दका अर्थ विभु श्रीकृष्ण :-
'आत्मा'-शब्दे कहे कृष्ण बृहत्त्वस्वरूप।
सर्वव्यापक, सर्वसाक्षी, परमस्वरूप ॥ 73 ॥
अनुवाद-'आत्मा'-शब्दसे श्रीकृष्णका बृहत्-स्वरूप
कहा गया है। वे सर्वव्यापक, सबके साक्षी और परम
स्वरूपसे युक्त हैं ॥ 73 ॥
श्रीमद्भागवत (11/2/45) श्लोककी व्याख्यामें
श्रीधरस्वामि-उद्धृत तन्त्र-वचन :-
आततत्वाच्च मातृत्वादात्मा हि परमो हरिः ॥ 74 ॥
अनुवाद-सर्वव्यापक और सबकी सृष्टि करनेवाले
होनेके कारण हरि ही परमात्मा हैं ॥ 74 ॥
अनुभाष्य-मध्यलीला 24/68 संख्या देखें ॥ 74 ॥
तीन प्रकारके अभिधेयमें श्रीकृष्णकी तीन प्रकारकी
प्रतीति-ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् :-
सेइ कृष्णप्राप्ति-हेतु त्रिविध 'साधन'।
ज्ञान, योग, भक्ति,-तिनेर पृथक् लक्षण ॥ 75 ॥
तिन साधने भगवान् तिन स्वरूपे भासे।
ब्रह्म, परमात्मा, भगवान्-त्रिविध-प्रकाशे ॥ 76 ॥
अनुवाद-ज्ञान, योग और भक्ति-ये तीन प्रकारके
'साधन' उन श्रीकृष्णकी प्राप्तिके कारण स्वरूप हैं और
तीनोंके अलग-अलग लक्षण हैं। भगवान् इन तीन
प्रकारके साधनोंके अनुरूप ब्रह्म, परमात्मा और
भगवान्-इन तीन रूपोंमें प्रकाशित होते हैं ॥ 75-76 ॥
श्रीमद्भागवत (1/2/11)में-
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ 77 ॥
अनुवाद-तत्त्वको जाननेवाले विज्ञगण अद्वयज्ञानको
तत्त्व कहते हैं। उसी अद्वयज्ञानकी प्रथम प्रतीति ब्रह्म,
द्वितीय प्रतीति परमात्मा और तृतीय प्रतीति भगवान्
हैं ॥ 77 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 2/11 संख्या देखें ॥ 77 ॥
'ब्रह्म-आत्मा'-शब्दे यदि कृष्णेरे कहय।
'रूढ़ि-वृत्त्ये' निर्विशेष अन्तर्यामी कय ॥ 78 ॥
अनुवाद-यद्यपि 'ब्रह्म' और 'आत्मा'-शब्द
श्रीकृष्णको ही सूचित करते हैं, तथापि रूढ़िवृत्तिसे
(प्रत्यक्षरूपसे) इन शब्दोंका अर्थ क्रमशः निर्विशेष ब्रह्म
और अन्तर्यामी (परमात्मा) सूचित होता है ॥ 78 ॥
ज्ञानमार्गमें चिन्मात्र ब्रह्म, योगमार्गमें
सचिन्मय परमात्म-प्रतीति :-
ज्ञानमार्गे-निर्विशेष-ब्रह्म प्रकाशे।
योगमार्गे-अन्तर्यामि-स्वरूपेते भासे ॥ 79 ॥
अनुवाद-अद्वयज्ञान श्रीकृष्ण ज्ञानमार्गके साधकोंके
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