श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1852, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 23/111-118 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
साक्षात् लक्ष्मीस्वरूपा महिषियाँ नीच व्यक्तिके स्पर्शके
पहले ही अन्तर्धान हो जातीं। इसलिये दूसरे शब्दोंमें
महिषियोंके द्वारा व्रजस्त्री रूपकी प्राप्ति ही जानना होगा।
विष्णुपुराणमें और ब्रह्मपुराणमें भी इस प्रकारके तात्पर्यसे
अवगत हुआ जाता है। जैसे, श्रीअर्जुनसे श्रीव्यासदेवने
कहा,–
“एवं तस्य मुनेः शापादष्टावक्रस्य केशवम्।
भर्त्तारं प्राप्य ता याता दस्युहन्ताः वराङ्गनाः॥”
“इस प्रकारसे उन अष्टावक्र मुनिके अभिशापसे वे
वराङ्गनाएँ (सुन्दर अङ्गोंवाली) केशवको पतिरूपमें प्राप्त
करके बादमें डाकुओंके हाथोंमें पड़ी थीं।”
पूर्वकालमें देवियोंने एक समय अष्टावक्र-मुनिका
स्तव करके उन्हें सन्तुष्ट किया और उन्होंने मुनिसे
यह वर प्राप्त किया कि विष्णु उनके पति होंगे। बादमें
मुनिवर जब उठे, तब उनके अङ्गोंको टेढ़ा देखकर वे
देवियाँ हँसने लगीं, उससे रुष्ट होकर मुनिने शाप भी
दिया कि ‘तुम डाकुओंके द्वारा अपहृत होगीगी।’ पुनः
उन्होंने मुनिको प्रसन्न करके उक्त शापसे मुक्ति प्राप्त की
थी। ऋषिवाक्य व्यर्थ नहीं होता, इसलिये उन्होंने
विष्णुको पतिरूपमें प्राप्त किया और बादमें वे डाकुओंके
द्वारा अपहृत हुई थीं। उनका डाकुओंके द्वारा अपहरण
होना और (पुनः) पतिको प्राप्त करना सिद्धान्तके
अनुसार ही हुआ था, क्योंकि उनके निजपति श्रीकृष्ण
ही डाकुरूपमें आये थे। इस बातको श्रीव्यासने पुनः
अन्य वाक्यके द्वारा बतलाया,—
“तत् त्वया न हि कर्तव्यः शोकोऽल्पोपि हि पाण्डव।
तेनाप्यखिलनाथेन सर्वं तदुपसंहतम्॥”
“हे पाण्डव! इसलिये तुम्हारे लिये सामान्य शोक
करना भी कर्त्तव्य नहीं है, क्योंकि उन अखिलनाथके
द्वारा ही (डाकुरूपमें) महिषियोंका अपहरण हुआ
था।”—यह व्याख्या जाननी होगी।’—(श्रीविश्वनाथ) अर्थात्
श्रीकृष्ण स्वयं ही गोप-डाकूके रूपमें उन महिषियोंका
हरण करके युगपत् (एक साथ ही) महिषियोंकी
अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये व्रजमें आकर्षण, ऋषिवाक्यकी
रक्षा और लोगोंकी आँखोंके सामने मायाजाल फैलाकर
अपनी लीलाकी महिमाके सर्वोत्कर्षको सङ्गोपन
करना—सबका एकसाथ उन्होंने साधन किया था।
गोप-डाकुरूपमें स्वयं श्रीकृष्ण ही आये थे, इसलिये
अमित बलशाली गाण्डीव धनुर्धारी श्रीअर्जुन निष्प्रभ
(निस्तेज) हो गये थे, अन्यथा उनकी बलहीनता
कल्पनासे परे है॥111-112॥
महाप्रभुके चरणोंमें श्रीसनातनका दैन्य और प्रार्थना :—
तबे सनातन प्रभुर चरणे धरिया।
निवेदन करे दन्ते तृण-गुच्छ लञा॥114॥
“नीचजाति, नीचसेवी, मुञि—सुपामर।
सिद्धान्त शिखाइला,—येह ब्रह्मार अगोचर॥115॥
तुमि ये कहिला, एइ सिद्धान्तामृत-सिन्धु।
मोर मन छुँइते नारे इहार एक बिन्दु॥116॥
अनुवाद—तब श्रीसनातन गोस्वामी महाप्रभुके चरणोंको
पकड़कर दाँतोंमें तृणका गुच्छा लेकर उनसे निवेदन
करने लगे,—“हे प्रभो! मैं नीच जातिका हूँ, मैंने नीच
लोगोंकी ही सेवा की है और मैं अत्यन्त अधम हूँ,
किन्तु तब भी आपने मुझे उन सब सिद्धान्तोंकी शिक्षा
प्रदान की है, जो ब्रह्माके लिये भी अगोचर हैं। आपने
जो कुछ वर्णन किया है, वह तो सिद्धान्तरूपी अमृतका
सिन्धु है। मेरा मन तो इसके एक बिन्दुको भी नहीं
छू सकता॥114-116॥
पङ्गु नाचाइते यदि हय तोमार मन।
वर देह’ मोर माथे धरिया चरण॥117॥
उल्लिखित भक्तिसिद्धान्तवाणीकी स्फूर्तिकी प्राप्तिके लिये
महाप्रभुके निकट वरकी याचना :—
‘मुञि ये शिखाइ तोरे स्फुरुक सकल।’
एइ तोमार वर हैते हवे मोर बल॥”118॥
अनुवाद—यदि इस पङ्गुको (लँगड़ेको) नचानेकी
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