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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1831, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1831

तेइसवाँ अध्याय 23/36-41 ]
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/17) :—
धन्यस्यायं नवप्रेमा यस्योन्मीलति चेतसि।
अन्तर्वाणिभिरप्यस्य मुद्रा सुष्ठु सुदुर्गमा॥ 36॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 36॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जिस धन्य व्यक्तिके चित्तमें
नवप्रेम उदित होता है, उसकी समस्त क्रियाएँ और
भावभङ्गिमा अर्थात् समस्त लक्षण शास्त्रज्ञ पुरुष भी
नहीं समझ सकते॥ 36॥
अनुभाष्य—
यस्य धन्यस्य (सफलार्थस्य भक्तजनस्य) चेतसि (चित्ते)
नवप्रेमा उन्मीलति (प्रकटो भवति) [तस्य] अस्य मुद्रा (चेष्टा)
अन्तर्वाणिभिः (शास्त्रविद्भिः) अपि सुष्ठु सुदुर्गमा (बोद्धुम्
अतीव अशक्या)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 36॥
प्रेमी भक्तोंके लक्षण और क्रिया-चेष्टा :—
श्रीमद्भागवत (11/2/40)में—
एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या
जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः।
हसत्यथो रोदिति रौति
गायत्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः॥ 37॥
अनुवाद—श्रीकृष्णसेवा-व्रतधारी पुरुष अवशचित्त
होकर अर्थात् अब उसका चित्त उसके वशमें नहीं है,
प्रियतम श्रीकृष्णके नामकीर्तनमें राग उत्पन्न होनेके
कारण शिथिल-हृदय हो जाता है। वह लोक-व्यवहारकी
अपेक्षासे रहित होकर उन्मत्तकी भाँति कभी हँसता,
कभी रोता, कभी चीत्कार करता और कभी गान-नृत्य
करता है॥ 37॥
अनुभाष्य—आदिलीला 7/94 संख्या देखें॥ 37॥
प्रेमकी गाढ़ताके तारतम्यका वैशिष्ट्य;
सबसे अन्तमें 'महाभाव' :—
प्रेमा क्रमे बाड़ि' हय स्नेह, मान, प्रणय।
राग, अनुराग, भाव, महाभाव हय॥ 38॥
अनुवाद—प्रेम क्रमशः बढ़ते-बढ़ते स्नेह, मान,
प्रणय, राग, अनुराग, भाव और महाभाव हो जाता
है॥ 38॥
उपमा :—
यैछे इक्षुरस-बीज—गुड़, खण्ड-सार।
शर्करा, सिता-मिछरि, शुद्धमिछरि आर॥ 39॥
बीजरूपी रति और प्रेमकी गाढ़-अवस्थाके समूहके
तारतम्यसे रसके आस्वादनकी अधिकताका तारतम्य :—
इँहा यैछे क्रमे क्रमे बाड़े निर्मल स्वाद।
रति-प्रेमादिर तैछे बाड़ये आस्वाद॥ 40॥
अनुवाद—जिस प्रकार गन्नेका बीज, गन्ना, रस, गुड़,
खाँड़, चीनी, सफेद मिश्री और शुद्ध-मिश्री एक ही
वस्तु होनेपर भी क्रमशः शुद्ध होनेपर उसका क्रमशः
स्वाद भी बढ़ता जाता है, उसी प्रकार रतिसे (जिसे
प्रेमका बीज कहा गया है, उससे) बढ़ते हुए प्रेमादिका
भी क्रमशः आस्वादन बढ़ता ही जाता है॥ 39-40॥
पाँच प्रकारकी रति :—
अधिकारी-भेदे रति—पञ्चप्रकार।
शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर आर॥ 41॥
अनुवाद—जीवके अधिकारके भेदसे रति शान्त,
दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन पाँच प्रकारकी
होती है॥ 41॥
अनुभाष्य—'रति'—(भःरःसिः पूःविः तृतीय लहरी)—
“व्यक्तं मसृणितेवान्तर्लक्ष्यते रतिलक्षणम्।
मुमुक्षुप्रभृतीनाञ्चेद्ववेदेषा रतिर्न हि।
किन्तु बालचमत्कारकारी तच्चिह्नवीक्षया।
अभिज्ञेन सुबोधोऽयं रत्याभास प्रकीर्तितः॥”
अर्थात् “आन्तरिक द्रवीभूतता जहाँ प्रकाशित होती
है, वही रतिका लक्षण है, किन्तु मुक्तिकामी अथवा
भोगकामीमें दिखनेपर उसे कभी भी 'रति' नहीं कहा
जाता है। श्रीकृष्णसेवासे अतिरिक्त अन्य अभिलाषासे
युक्त इस रतिके लक्षणोंको देखकर अज्ञानी सरल
। 385