श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1824, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 23/4-7 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
‘प्रेम’ कहलाती है। उस प्रेमको श्रीकृष्णभक्ति रसका
‘स्थायीभाव’ कहते हैं॥4॥
भावकी संज्ञा; स्वरूप और तटस्थ-लक्षण :-
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/3/1)—
शुद्धसत्त्वविशेषात्मा प्रेम-सूर्यांशु-साम्यभाक्।
रुचिभिश्चित्तमासृण्यकृदसौ भाव उच्यते ॥5॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥5॥
अमृतप्रवाह भाष्य—प्रेमसूर्यका (जो) किरण-स्थानीय
विशुद्धसत्त्वस्वरूप है, (और) रुचिके द्वारा चित्तको जो
तत्त्व द्रवीभूत करता है, उसको ही ‘भाव’ कहते
हैं॥5॥
अनुभाष्य—
शुद्धसत्त्वविशेषात्मा (भगवतः कृष्णस्य सर्वप्रकाशक-
संविदाख्य-स्वरूपशक्तिवृत्तिरूपः शुद्धसत्त्वविशेषः, स एव आत्मा
तन्नित्यप्रियजनाधिष्ठानतया नित्यसिद्धं स्वरूपं यस्य सः)
प्रेमसूर्यांशु-साम्यभाक् (प्रेमरूप-सूर्यकिरणसादृश्ययुक्तः—प्रेमणः अत्र
प्रथमच्छविरूपः) रुचिभिः (प्राप्त्यभिलाष-सकर्त्तृकानुकूल्याभिलाष-
सौहार्द्दाभिलाषैः) चित्तमासृण्यकृत् (चित्तार्द्रता-सम्पादकः) असौ
भावः (प्रेमाङ्कुररूपः) उच्यते।
श्लोक-भावानुवाद—भगवान् श्रीकृष्णकी सर्वप्रकाशक
संवित् नामक जो स्वरूपकी वृत्ति है, वह शुद्धसत्त्वविशेष
ही प्रेमाभक्तिका आश्रय या आत्मा है। यह प्रेम
श्रीकृष्णके नित्य प्रियजनोंमें स्थित रहता है, अतः प्रेमका
स्वरूप नित्यसिद्ध है। ऐसे प्रेमरूप सूर्यकी किरणोंके
समान भाव माना गया है। निष्कर्षतः भाव प्रेमकी प्रथम
छविरूप है। वह प्रियकी प्राप्तिकी अभिलाषा, उस प्राप्ति
हो जानेपर प्राप्तिसे उत्पन्न (सकर्त्तृक) आनुकूल्यकी
अभिलाषा और सौहार्दकी अभिलाषा, इन तीन रुचियोंसे
सामाजिकके चित्तमें आर्द्रता सम्पादित कर देता है, इसी
प्रेमाङ्कुरको भाव कहते हैं॥5॥
प्रेमके लक्षणका वर्णन :—
एइ दुइ,—भावेर 'स्वरूप', 'तटस्थ' लक्षण।
प्रेमेर लक्षण एबे शुन, सनातन ॥6॥
अनुवाद—भावके ये दो ‘स्वरूप’ और ‘तटस्थ’
लक्षण हैं। हे सनातन, अब तुम प्रेमके लक्षण
सुनो॥6॥
अमृतप्रवाह भाष्य—शुद्धसत्त्वस्वरूप ही भावका
‘स्वरूप’-लक्षण है; रुचिके द्वारा चित्तको जो द्रवीभूत
करता है,—यह भावका ‘तटस्थ’-लक्षण है॥6॥
अनुभाष्य— ‘एइ दुइ’—श्लोकमें लिखित
(1) शुद्धसत्त्वविशेषात्मादि—भावका स्वरूप-लक्षण है,
(2) रुचिके द्वारा चित्तका द्रवीभूत होना—भावका
तटस्थ-लक्षण है।
'दुइ भावेर'—[भःरःसिः 1/3/6]—
'साधनाभिनिवेशेन कृष्ण-तद्भक्तयोस्तथा।
प्रसादेनातिधन्यानां भावो द्वेधाभिजायते॥”
[अर्थात् “महासौभाग्यशाली व्यक्तियोंमें दो प्रकारसे
भाव उत्पन्न होता है—] (1) साधनमें अभिनिवेशसे
उत्पन्न भाव, (2) श्रीकृष्ण और उनके भक्तोंकी कृपासे
उत्पन्न भाव।”]
और कोई-कोई उक्त दो भावोंके ‘केवला’ और
‘मिश्रा’ अर्थ करते हैं; किन्तु यह अर्थ यहाँ सङ्गत नहीं
है, पहले कहा गया अर्थ ही सङ्गत है॥6॥
प्रेमकी संज्ञा :—
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/4/1)—
सम्यङ्मसृणितस्वान्तो ममत्वातिशयाङ्कितः।
भावः स एव सान्द्रात्मा बुधैः प्रेमा निगद्यते ॥7॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥7॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जब वह भाव चित्तको सम्पूर्ण
रूपसे द्रवीभूत करके अत्यन्त ममताके द्वारा जाना
जाता है और स्वयं गाढ़स्वरूप होता है, तब उसको
पण्डितगण ‘प्रेम’ कहकर बुलाते हैं॥7॥
अनुभाष्य—
सम्यक् मसृणितस्वान्तः (मसृणितः आर्दीकृतं स्वान्तं यस्मात्)
सः ममत्वातिशयाङ्कितः (ममत्वातिशययुक्तः—इति तटस्थ-
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