श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1820, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 22/159-163 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अमृतप्रवाह भाष्य—पति, पुत्र, सुहृत्, भाई, पिता,
मित्रादिके रूपमें श्रीहरिका जो सदा उत्साहपूर्वक ध्यान
करते हैं, उन्हें बारम्बार नमस्कार है ॥ 159 ॥
अनुभाष्य—
इह (अस्मिन् जगति) ये (भक्ताः जनाः) सदा उद्युक्ताः
(उत्साहयुक्ताः सन्तः) हरिं (भगवन्तं) पतिपुत्रसुहृद्भ्रातृपितृवत्
मित्रवत् च ध्यायन्ति, तेभ्यः अपि नमः नमः।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 159 ॥
प्रतिक्षण गुरुके आनुगत्यमें निर्दिष्ट अभीष्टसेवासे ही
रागानुग-साधककी सिद्धि अथवा भावभक्तिकी प्राप्ति :-
एइमत करे येबा रागानुगा-भक्ति।
कृष्णेर चरणे ताँर उपजाय 'प्रीति' ॥ 160 ॥
अनुवाद—जो इस प्रकार रागानुगा-भक्तिका पालन
करता है, उसकी श्रीकृष्णके चरणोंमें 'प्रीति' उत्पन्न होती
है॥ 160 ॥
अनुभाष्य—जो 'इस प्रकार' अर्थात् बाहरसे साधकदेहमें
सुनी हुई हरिकथाकी कीर्तनके द्वारा सेवा और मनमें
श्रीकृष्ण-सेवोपयोगी अपने रसके अनुकूल सिद्धदेहसे
सदा व्रजमें श्रीराधाकृष्णकी सेवा करते हैं, वे शास्त्र
अथवा गुरुके शासनके बलसे वैधीभक्तिके बदले अपनी
स्वाभाविक जातरुचिके प्रभावसे रागानुग-पथपर चलते-
चलते श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रगाढ़ प्रीति प्राप्त करते हैं।
रागानुग-मार्गमें ही रति अथवा भावके प्रभावसे श्रीकृष्ण
वशीभूत होते हैं और तभी श्रीकृष्णप्रेमसेवाकी प्राप्ति
होती है ॥ 159-160 ॥
बाइसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त।
(2) 'साध्य' भावभक्ति अथवा रतिका वर्णन :-
श्रीकृष्णप्रेमकी अस्फुट अवस्था ही श्रीकृष्णको आकर्षित
करनेवाली 'भावभक्ति' अथवा 'रति'-
प्रीत्यङ्कुरे 'रति', 'भाव'-हय दुइ नाम।
याहा हैते वश हन श्रीभगवान् ॥ 161 ॥
अनुवाद—प्रीतिके अङ्कुरके रति और भाव—ये दो
नाम हैं। इनके द्वारा श्रीभगवान् वशीभूत हो जाते
हैं॥ 161 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य— 'प्रीत्यङ्कुरे 'रति', 'भाव'-हय दुइ
नाम'-प्रेमके अथवा प्रीतिके अङ्कुरके दो नाम हैं
अर्थात् 'रति' और 'भाव' ॥ 160-161 ॥
बाइसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त।
भाव अथवा रतिके उदित होने तक ही 'साधन'रूप
'अभिधेय'; उसीसे 'प्रयोजन'की प्राप्ति :-
याहा हैते पाइ कृष्णेर प्रेमेर सेवन।
एइत' कहिलुँ 'अभिधेय' विवरण ॥ 162 ॥
अनुवाद—जिससे श्रीकृष्णकी प्रेम-सेवाकी प्राप्ति
होती है, मैंने तुम्हें उसी 'अभिधेय'के विषयमें बतलाया
है ॥ 162 ॥
अभिधेय साधनभक्ति संक्षेपमें वर्णित :-
अभिधेय, साधन-भक्ति एबे कहिलुँ सनातन।
संक्षेपे कहिलुँ, विस्तार ना याय वर्णन॥"163 ॥
अनुवाद—हे सनातन, मैंने अभिधेय साधन-भक्तिका
संक्षेपमें वर्णन किया है, क्योंकि विस्तारसे इसका वर्णन
नहीं किया जा सकता ॥ 163 ॥
374 |