श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1818, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 22/152-156 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
हैं—प्राथमिक और नित्य। 'प्राथमिक' साधकगण नाम
संख्याकी वृद्धि करते-करते (क्रमशः) नामकीर्तनमें
नैरन्तर्य प्राप्त करते हैं। नैरन्तर्य प्राप्त करके वे 'नित्य
साधक' हो जाते हैं। 'प्राथमिक' साधकोंकी अविद्यारूपी
पित्तरोगसे तप्त-रसनाकी नाममें 'रुचि' नहीं होती।
तुलसीमालापर संख्यापूर्वक निरन्तर नाम करते-करते
(अन्तमें) नैरन्तर्य-सिद्धि या 'नित्य'-अवस्थामें नाममें
आदर होता है। इस अवस्थामें नामोच्चारण-रहित
होनेपर अच्छा नहीं लगता। आदरके सहित निरन्तर
नाम करते-करते नाममें परमास्वाद उत्पन्न होता है। उस
समय पाप, पापबीज और इस सबका मूल जो
अविद्या-अभिनिवेश है, वह स्वयं दूर हो जाता है और
नरस्वभावके जो समस्त अनर्थ हैं, वे क्रमशः दूर हो
जाते हैं और नामका परमानन्दमय स्वरूप-साक्षात्कार
होता है।"-(श्रीचैतन्य-शिक्षामृत 6/4)। इसलिये नाममें
रुचिप्राप्त, नामानुशीलनके प्रभावसे अविद्या-अभिनिवेशसे
मुक्त और निवृत्त-अनर्थ एवं श्रीनामके स्वरूप-अनुभवकारी
'नित्य साधक' रागानुगा भक्तिमें अधिकारी होते हैं। वे
श्रीगुरुकी कृपासे युगपत् (एक साथ) बाह्य साधकदेहसे
अनुक्षण श्रवण-कीर्तन और भीतरमें अपनी सिद्धदेहसे
श्रीराधाकृष्णकी सेवा करनेमें समर्थ होते हैं। किन्तु
श्रीनाममें अजातरुचि (जिनकी रुचि जाग्रत नहीं हुई),
प्राकृत-अभिनिवेशयुक्त और अनर्थयुक्त 'प्राथमिक' साधकोंके
लिये उस प्रकारकी चेष्टा नितान्त ही अनधिकार-चर्चा
है और कष्टकल्पना मात्र है॥ 152-153 ॥
अनुभाष्य—
अत्र (रागानुगा-भक्तिसाधने) तद्भावलिप्सुना (तत् तस्य
व्रजस्थितस्य निजाभीष्टस्य कृष्णप्रेष्ठस्य गुरोः यः भावः तस्य
लिप्सुना तदनुगमनेन निजायत्तीकर्त्तुमिच्छुना) साधकरूपेण
(साधकशरीरे कीर्त्तनाख्यभक्त्याश्रितेन) सिद्धरूपेण (स्वरूपसिद्धौ
नित्यसेवनोपयोगि-मानसदेहेन) च व्रजलोकानुसारतः
(तदनुराणि-व्रजजनानुगत्येन) सेवा हि कार्या (करणीया)।
श्लोक-भावानुवाद-रागानुगा-भक्तिसाधनमें व्रजमें
स्थित निजाभीष्ट श्रीकृष्णके अति प्रिय गुरुका जो भाव
है, उसके लोभसे उनके आनुगत्यमें स्वयं वैसी सेवा
करनेके इच्छुक साधक शरीरसे कीर्त्तनाख्य भक्तिका
आश्रय और सिद्ध-स्वरूपसे नित्यसेवोपयोगी मानस-देहसे
व्रजवासियोंके अनुसार सेवा कार्य करेंगे।। 154 ॥
रागानुग-भक्तकी सब समय गुरुके आनुगत्यमें
अपनी अभीष्ट सिद्धसेवा :-
निजाभीष्ट कृष्णप्रेष्ठ पाछे त' लागिया।
निरन्तर सेवा करे अन्तर्मना हञा ॥ 155 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 155 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-व्रजवासी भक्तगण ही श्रीकृष्णके
प्रियतम हैं; उनमेंसे जो जिस व्रजभक्तके माधुर्यके कारण
लोभपूर्वक उसके अनुगमन (आनुगत्य)में अभीष्ट सेवाकी
कामना करते हैं, वे उनके पीछे-पीछे रहकर अन्तर्मना
होकर निरन्तर श्रीकृष्णसेवा करते हैं॥ 155 ॥
शास्त्र-प्रमाण :-
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/295)—
सेवा साधकरूपेण सिद्धरूपेण चात्र हि।
तद्भावलिप्सुना कार्या व्रजलोकानुसारतः॥ 154 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 154 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-रागात्मिका-भक्तिमें जिनका लोभ
होता है, वे व्रजवासियोंके कार्योंके अनुसार साधकरूपमें
बाहरसे और सिद्धरूपमें भीतरमें सेवा करते हैं॥ 154 ॥
अनर्थ-निवृत्ति प्राप्त रागानुग-भक्तका
निर्जनमें अभीष्टका स्मरणादि :-
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/294)—
कृष्णं स्मरन् जनञ्चास्य प्रेष्ठं निजसमीहितम्।
तत्तत्कथा-रतश्चासौ कुर्याद्वासं व्रजे सदा ॥ 156 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 156 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्ण और उनके निज-निर्वाचित
प्रियतमजनोंको सदा स्मरण करते हुए उन-उन कथाओंमें
रत होकर सर्वदा व्रजमें वास करेंगे। शरीरसे व्रजवास
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