श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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बाइसवाँ अध्याय 22/142-148 ]
[बायाँ स्तम्भ]
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 142 ॥
शुद्धभक्त दूसरोंको उद्वेग नहीं देते :-
स्कन्दपुराणके वचन-
एते न ह्यद्भुता व्याध तवाहिंसादयो गुणाः।
हरिभक्तौ प्रवृत्ता ये न ते स्युः परतापिनः ॥ 143 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 143 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-हे व्याध, तुममें जो अहिंसादि
गुण उत्पन्न हुए हैं, वह अद्भुत नहीं है, क्योंकि, जो
हरिभक्तिमें प्रवृत्त होता है, वह दूसरोंको कष्ट देनेवाला
नहीं होता ॥ 143 ॥
अनुभाष्य-
हे व्याध, तव एते अहिंसादयः गुणाः अद्भुताः (असाधारणाः)
न; हि (यतः) ये (जनाः) हरिभक्तौ (कृष्णभजने) प्रवृत्ताः
(अनुरताः), ते (भक्ताः) परतापिनः (अपरद्रोहपराः) न स्युः
(भवन्ति)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 143 ॥
(ख) रागानुगा-भक्तिका वर्णन :-
वैधीभक्ति-साधनेर कहिलुँ विवरण।
रागानुगा-भक्तिर लक्षण शुन, सनातन ॥ 144 ॥
अनुवाद-हे सनातन, यहाँ तक मैंने वैधीभक्तिके
साधनके विषयमें बतलाया। अब तुम रागानुगा-भक्तिके
लक्षण सुनो ॥ 144 ॥
रागात्मिका और रागानुगा-भक्तिका परिचय :-
रागात्मिका-भक्ति-'मुख्या' व्रजवासि-जने।
तार अनुगत भक्तिर 'रागानुगा'-नामे ॥ 145 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 145 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-व्रजवासी भक्तोंकी जो रागस्वरूपा
(रागात्मिका) भक्ति है, वही मुख्य है अर्थात् वैसी भक्ति
और कहीं भी नहीं है। व्रजवासियोंके अनुगत होकर
जो भक्ति विद्यमान रहती है, उसका नाम ही रागानुगा
भक्ति है ॥ 145 ॥
[दायाँ स्तम्भ]
रागात्मिका-भक्तिकी संज्ञा :-
भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/272)-
इष्टे स्वारसिकी रागः परमाविष्टता भवेत्।
तन्मयी या भवेद्भक्तिः सात्र रागात्मिकोदिता ॥ 146 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 146 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-इष्टवस्तुमें स्वाभाविकी और
परमाविष्टतामयी जो सेवनवृत्ति है, उसका नाम 'राग' है;
श्रीकृष्णभक्ति तन्मयी (वैसी रागमयी) होनेपर 'रागात्मिका'
नामसे कही जाती है ॥ 146 ॥
अनुभाष्य-
इष्टे (अभीष्टवस्तुनि या) स्वारसिकी (स्वीय-सिद्धरसोपयोगिनी
स्वाभाविकी गाढ़तृष्णामयीत्यर्थः) परमाविष्टता (तदभिनिवेशमयी
सेवनप्रवृत्तिः सा,) रागः भवेत्। तन्मयी (एवम्विध रागमयी) या
भक्तिः भवेत्, अत्र (शुद्धभक्तिसाहित्ये) सा 'रागात्मिका' उदिता
(कथिता)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 146 ॥
रागात्मिका-भक्तिके 'स्वरूप' और 'तटस्थ' लक्षण-
'गाढ़तृष्णा' और 'आविष्टता' :-
इष्टे 'गाढ़-तृष्णा'-रागेर स्वरूप-लक्षण।
इष्टे 'आविष्टता'-तटस्थ-लक्षण कथन ॥ 147 ॥
रागमयी भक्तिर हय 'रागात्मिका' नाम।
ताहा शुनि' लुब्ध हय कोन भाग्यवान् ॥ 148 ॥
अनुवाद-इष्ट-वस्तुमें 'गाढ़-तृष्णा'-रागका स्वरूप-
लक्षण है और इष्ट-वस्तुमें 'आविष्टता'को तटस्थ
लक्षण कहा जाता है। रागमयी भक्तिका नाम ही
'रागात्मिका' भक्ति है। उसके विषयमें सुनकर किसी
भाग्यवान्को ही लोभ होता है ॥ 147-148 ॥
अनुभाष्य-अपने आनुकूल्य-विषय अर्थात् अभीष्ट
वस्तुमें गाढ़-तृष्णारूपी राग ही मुख्य अर्थात् स्वरूप-
लक्षण है। कार्यके द्वारा जिसका ज्ञान होता है, उसे
तटस्थ-लक्षण कहते हैं, वही यहाँपर अभीष्ट वस्तुमें
आविष्टता है ॥ 147-148 ॥
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