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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1798, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1798

[ 22/85-89 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
मृग (स्त्रीके हाथके खिलौने) असाधुओंका सङ्ग कभी
भी मत करना। अन्य किसी भी वस्तुसे जीवका ऐसा
मोहका बन्धन नहीं होता, जैसा स्त्रीसङ्गसे और
स्त्रीसङ्गीके सङ्गसे होता है॥ 85-87॥
अनुभाष्य- भगवान् कपिलदेव देवहूतिको पाप-पुण्यके
कारण श्रीकृष्णविमुख स्वरूप-विस्मृत जीवके जन्मसे
पूर्व योनि-भ्रमण और गर्भवास-यन्त्रणाका वर्णन करके
जन्म होनेके बाद बाल्य, पौगण्ड और यौवन अवस्थामें
अनेक प्रकारके इन्द्रियभोगों अथवा स्त्रीसङ्गकी स्पृहा,
उसके प्रभाव और कुफलकी बात तीन श्लोकोंमें
बतला रहे हैं-
यत्सङ्गात् (येषां असतां सङ्गवशात्) सत्यं शौचं दया मौनं
बुद्धिः (पारमार्थिकीत्यर्थः) ह्रीः श्रीः (भक्तिसम्पत्) यशः क्षमा
शमः दमः भगः (ऐश्वर्यं वैभवं वा) इति संक्षयं (सम्यक्
विनाशं) याति (प्राप्नोति), तेषु अशान्तेषु (जड़विषयभोग-लम्पटेषु)
मूढेषु असाधुषु खण्डितात्मसु (प्राकृतदेहादौ अप्राकृतात्मबुद्धिषु)
योषित्क्रीड़ा-मृगेषु (स्त्रीणां क्रीड़ामृगाः एकान्त-वशीभूताः तेषु
स्त्रैणेषु) शोच्येषु (दुःखाश्रयेषु) असाधुषु (अवैष्णवेषु) सङ्गं न
कुर्यात्। अस्य (पुंसः) यथा योषित्सङ्गात् (जड़भोक्तृबुद्धया
भोग्य-सहवासेन), यथा [च] तत्सङ्गिसङ्गतः (योषिद्भोक्तॄणां
रक्त-शुक्रमय-देहादौ आत्मबुद्धीनां वा सहवासेन), मोहः (बुद्धिनाशः)
बन्धः (भवबन्धः) च भवेत्, तथा अन्यप्रसङ्गतः न भवेत्।
श्लोक-भावानुवाद-जिन असत् लोगोंके सङ्गसे
सत्य, पवित्रता, दया, मौन, बुद्धि (पारमार्थिक), लज्जा,
श्री (भक्तिरूपी सम्पत्ति), यश, क्षमा, शम, दम और
ऐश्वर्य आदि सब कुछ ही सम्पूर्णरूपसे नष्ट हो जाता
है, उन जड़विषयभोग-लम्पट मूर्ख देहात्मबुद्धिवाले
स्त्री-क्रीड़ा-मृग (स्त्रीके सम्पूर्ण वशीभूत) असाधुओंका
सङ्ग कभी भी मत करना। अन्य किसी भी वस्तुसे
जीवका ऐसा मोहका बन्धन नहीं होता, जैसा स्त्रीसङ्गसे
(जड़भोगबुद्धिसे स्त्रीके भोग और सहवाससे) और
स्त्रीसङ्गीके (स्त्रीभोगकामी जिसकी रक्त-शुक्रमय देहमें
आत्मबुद्धि है, ऐसे व्यक्तिके सङ्गीके) सङ्गसे होता
है॥ 85-87॥
हरिविमुख-सङ्गके प्रति भक्तका मनोभाव :-
कात्यायनसंहिता-वचन-
वरं हुतवहज्वाला-पञ्जरान्तर्व्यवस्थितिः।
न शौरिचिन्ताविमुख-जनसंवासवैशसम्॥ 88॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 88॥
अमृतप्रवाह भाष्य-अग्निकी ज्वालामें और पिञ्जरेमें
बन्द होनेसे जो कष्ट होता है, उसे सहन करना तब
भी उचित है, किन्तु श्रीकृष्णके चिन्तनसे बहिर्मुख
व्यक्तियोंका कष्ट प्रदान करनेवाला सङ्ग कभी भी मत
करना। तात्पर्य यह है कि यदि कभी भी आगमें
जलकर मरने अथवा कारागारमें बन्द होना पड़े, उसे
भी स्वीकार करना, किन्तु श्रीकृष्ण बहिर्मुख लोगोंके
साथ सङ्ग मत करना॥ 88॥
अनुभाष्य-
हुतवहज्वाला-पञ्जरान्तर्व्यवस्थितिः (प्रज्वलितवह्निश्खिायां
पिञ्जरमध्यनिवासः अपि) वरं [प्रार्थनीयः तथापि] शौरिचिन्ताविमुख-
जनसंवास-वैशसं (शौरेः कृष्णस्य चिन्तायाः विमुखः जनः
तेन सह सम्यक् वासः, स एव वैशसं विपत्पातः) न।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 88॥
विष्णुभक्तिरहित व्यक्तिके प्रति व्यवहारकी विधि :-
गोस्वामीपादोक्ति-
मा द्राक्षीः क्षीणपुण्यान् क्वचिदपि
भगवद्भक्तिहीनान् मनुष्यान्॥ 89॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 89॥
अमृतप्रवाह भाष्य-भगवद्भक्तिविहीन मन्द-भाग्य
मनुष्योंको कभी भी मत देखना॥ 89॥
अनुभाष्य-
भगवद्भक्तिहीनान् (कृष्णसेवाविहीनान्) क्षीणपुण्यान् (मन्दभाग्यान्)
मनुष्यान् क्वचित् (लौकिक-मर्यादौ) अपि मा (न) अद्राक्षीः
(पश्येत्)।
श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 89॥
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