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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1775

बाइसवाँ अध्याय 22/7-15 ]
शक्तिमान्-अभेद-तत्त्व हैं। 'शक्ति'-शब्दसे भूलकर भी
किसीको जीवके स्वरूपका आवृत करनेवाली मायाशक्तिको
नहीं समझना चाहिये। जो शक्ति श्रीकृष्ण-स्वरूपकी
सेवामें ही केवलमात्र नियुक्त है, वह स्वरूपशक्ति उस
मायाशक्तिसे पृथक् है। स्वरूपशक्ति और स्वरूपशक्तिमान्
श्रीकृष्ण अभिन्न रूपमें अवस्थित हैं॥7॥
असंख्य वैकुण्ठोंमें स्वांश विष्णुरूपमें और ब्रह्माण्डोंमें
जीवरूपमें लीला-विलास :-
स्वांश-विभिन्नांश-रूपे हञा विस्तार।
अनन्त वैकुण्ठ-ब्रह्माण्डे करेन विहार॥8॥
अनुवाद-श्रीकृष्ण स्वांश और विभिन्नांश रूपमें
अपना विस्तार करके असंख्य वैकुण्ठों एवं ब्रह्माण्डोंमें
विहार करते हैं॥8॥
स्वांश-विलास चतुर्व्यूह और अवतारगण-श्रीकृष्णस्वरूप या
शक्तिमान् हैं; जीव-विभिन्नांश या शक्तितत्त्व हैं :-
स्वांश-विस्तार-चतुर्व्यूह, अवतारगण।
विभिन्नांश जीव-ताँर शक्तिते गणन॥9॥
अनुवाद-श्रीकृष्ण स्वांशका विस्तार चतुर्व्यूह और
अवतारोंके रूपमें करते हैं। विभिन्नांश जीवोंकी गणना
श्रीकृष्णकी शक्तिके रूपमें होती है॥9॥
दो प्रकारके जीव :-
सेइ विभिन्नांश जीव-दुइ त' प्रकार।
एक-'नित्यमुक्त', एक- 'नित्य-संसार' ॥10॥
अनुवाद-वे विभिन्नांश जीव दो प्रकारके हैं।
एक-'नित्यमुक्त' और दूसरे 'नित्य-संसार' अर्थात्
नित्यबद्ध हैं॥10॥
(1) नित्यमुक्तका चरित्र :-
'नित्यमुक्त'-नित्य कृष्णचरणे उन्मुख।
'कृष्ण-पारिषद' नाम, भुञ्जे सेवा-सुख॥11॥
अनुवाद-'नित्यमुक्त' जीव सदा श्रीकृष्णके उन्मुख
रहकर उनके श्रीचरणोंकी सेवा करते हैं, वे श्रीकृष्णके
परिकर कहलाते हैं और वे सेवारूपी सुखका आस्वादन
करते हैं॥11॥
(2) नित्यबद्ध जीवका चरित्र :-
'नित्यबद्ध' - कृष्ण हैते नित्य-बहिर्मुख।
'नित्यसंसार', भुञ्जे नरकादि-दुःख॥12॥
अनुवाद-'नित्यबद्ध' जीव श्रीकृष्णसे अनादिकालसे
बहिर्मुख हैं। इसलिये वे 'नित्यसंसार' अर्थात् भोक्ताभिमानसे
सदा संसारमें ही बद्ध हैं और अपने कर्मोंके फलस्वरूप
नरकादि दुःखोंका भोग करते हैं॥12॥
श्रीकृष्ण-विमुखताका फल अथवा दण्ड :-
सेइ दोषे माया-पिशाची दण्ड करे तारे।
आध्यात्मिकादि तापत्रय तारे जारि' मारे॥13॥
काम-क्रोधेर दास हञा तार लाथि खाय।
भ्रमिते भ्रमिते यदि साधु-वैद्य पाय॥14॥
उद्धारका उपाय :-
ताँर उपदेश-मन्त्रे पिशाची पलाय।
कृष्णभक्ति पाय, तबे कृष्ण-निकट याय॥15॥
अनुवाद-श्रीकृष्णसे बहिर्मुखतारूपी दोषके कारण
माया-पिशाची बद्धजीवोंको दण्डित करती है। वह उन्हें
आध्यात्मिकादि (देह और मनके द्वारा प्रदत्त, दूसरे
प्राणियोंके द्वारा प्रदत्त और दैविक प्रकोपके द्वारा प्रदत्त)
तीन प्रकारके तापोंमें झुलसाकर कष्ट प्रदान करती है।
बद्धजीव कामका दास बनकर और जब काम पूर्तिमें
बाधा आती है, तब उससे उत्पन्न क्रोधका दास बनकर
मायाकी ठोकरें खाता है। इस प्रकार ठोकरें खाते-खाते
यदि उसे साधुरूपी वैद्यकी प्राप्ति होती है, तब साधुके
उपदेशरूपी मन्त्रके द्वारा माया-पिशाची दूर भाग जाती
है और वह जीव श्रीकृष्णभक्तिको प्राप्त करता है।
भक्तिके प्रभावसे तब वह श्रीकृष्णके निकट पहुँच जाता
है॥13-15॥
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