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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1742, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1742

[ 21/24-31 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुवाद—श्रीकृष्णकी इस लीलाको देखकर हमारे
ब्रह्माण्डके ब्रह्मा मोहित तथा विस्मित हो गये। श्रीकृष्णकी
स्तुति करनेके पश्चात् उन्होंने निश्चित किया,—“जो
कहता है कि मैं श्रीकृष्णके वैभवके विषयमें सब कुछ
जानता हूँ, वह जानता है तो जाने, किन्तु मैं तो अपने
काय और मनसे यही मानता हूँ कि आपके अनन्त
वैभव-अमृतके सिन्धुकी एक बूँदकी महिमा भी मेरे
वाणी और मनके अगोचर है॥ 24-26 ॥
श्रीमद्भागवत (10/14/38)में :—
जानन्त एव जानन्तु किं बहूक्त्या न मे प्रभो।
मनसो वपुषो वाचो वैभवं तव गोचरः ॥ "27 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 27 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—जो कहते हैं,—'मैं श्रीकृष्णतत्त्व
जानता हूँ', तो वे जानें, किन्तु मैं बहुत कुछ बोलना
नहीं चाहता हूँ। प्रभो! मैं केवल इतना ही कहता हूँ
कि आपका समस्त वैभव—मेरे मन, शरीर और
वाणीके अगोचर है॥ "27॥
अनुभाष्य—बछड़ोंको हरण करनेके फलस्वरूप
श्रीकृष्णके द्वारा ब्रह्माका अभिमान चूर्ण होनेपर ब्रह्मा
श्रीकृष्णके भक्तवात्सल्य और उनके अधोक्षज होनेका
वर्णन कर रहे हैं—
हे प्रभो, जानन्तः (विज्ञाः त्वदचिन्त्यानन्तगुणगण-
ज्ञानाभिमानिनः) एव जानन्तु, बहूक्त्या (अति प्रजल्पेन) किम्
(अधिक-वाग्वेगेन फलं नास्तीत्यर्थः)। तव वैभवं मे (मम
ब्रह्मणः) वपुषः मनसः वाचः (कायमनोवाक्यानां) न गोचरः
(न विषयः, न स्पर्शाधिकारः भवति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 27 ॥
श्रीकृष्णसे अभिन्न श्रीवृन्दावन-धाम :—
कृष्णेर महिमा रहु—केबा तार ज्ञाता।
वृन्दावन-स्थानेर देख आश्चर्य विभुता ॥ 28 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णकी महिमाकी बात तो छोड़ो, उसे
कौन जान सकता है? वृन्दावन धामकी ही आश्चर्यपूर्ण
सर्वव्यापकताको देखो॥ 28 ॥
वृन्दावनके एक प्रान्तमें परव्योममें स्थित
अनन्त करोड़ों वैकुण्ठ :—
षोलक्रोश वृन्दावन,—शास्त्रेर प्रकाशे।
तार एकदेशे वैकुण्ठजाण्डगण भासे ॥ 29 ॥
अनुवाद—शास्त्रोंके अनुसार वृन्दावनका परिमाण
मात्र सोलह कोस है, किन्तु उसी वृन्दावनके एक भागमें
ही अनन्तकोटि वैकुण्ठ और अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड
स्थित हैं॥ 29 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—व्रजमण्डलमें जो बारह वन
हैं—वे सब मिलाकर चौरासी कोस परिमाण होता है।
उनमेंसे वृन्दावन-नामक वन वर्तमान समयमें
वृन्दावन-नगरकी सीमासे नन्दग्राम-वृषभानुपुर (बरसाना)
तक सोलह कोस है॥ 29 ॥
अनुभाष्य—शास्त्रोंमें वृन्दावन 'सोलह कोस'का कहा
गया है। इसीके एक भागमें समस्त वैकुण्ठ और बहुत
विस्तृत ब्रह्माण्ड प्रकाशित हैं॥ 29 ॥
असीम श्रीकृष्णवैभवसिन्धुकी एक बूँदका निर्देश :—
अपार ऐश्वर्य कृष्णेर—नाहिक गणन।
शाखा-चन्द्र-न्याये करि दिग्दर्शन ॥ 30 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्णका ऐश्वर्य अपार है—उसकी
गणना नहीं की जा सकती। मैं तो केवल
शाखा-चन्द्र-न्यायसे उसका दिग्दर्शन करा रहा हूँ॥ 30 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—'शाखा-चन्द्र-न्याय'—चन्द्रको एक
शाखाके पीछे दिखलाकर जिस प्रकार चन्द्रका परिचय
दिया जाता है, उसी प्रकार किसी तत्त्वके एक भागको
दिखलाकर सब भागोंका कुछ ज्ञान दिया जाता है। इसी
न्यायको 'शाखा-चन्द्र-न्याय' कहते हैं॥ 30 ॥
वाणी और मनसे अतीत श्रीकृष्णके ऐश्वर्यके
वर्णनमें महाप्रभुकी विह्वलता :—
ऐश्वर्य कहिते स्फुरिल ऐश्वर्य-सागर।
मनेन्द्रिय डुबिला, प्रभु हइला फाँपर ॥ 31 ॥
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