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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1729, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1729

बीसवाँ अध्याय 20/366-373 ]
अमृतप्रवाह भाष्य—'शक्त्यावेश'—ये गौण और मुख्यके
भेदसे दो प्रकारके होते हैं। जिनमें साक्षात् शक्तिका
अवतार होता है,—वे मुख्यशक्त्यावेश-अवतार हैं। और
जिनमें शक्तिका आभासमात्र विभूतिके रूपमें देखा जाता
है, वे गौणशक्त्यावेश-अवतार हैं॥ 366॥

  1. मुख्यावेशावतारोंके नाम :-
    'सनकादि', 'नारद', 'पृथु', 'परशुराम'।
    जीवरूप 'ब्रह्मा' आवेशावतार-नाम॥ 367॥
    अनुवाद—सनकादि, नारद, पृथु, परशुराम और
    जीवरूप ब्रह्मा शक्त्यावेश-अवतार कहलाते हैं॥ 367॥
    वैकुण्ठे 'शेष'—धरा धरये 'अनन्त'।
    एइ मुख्यावेशावतार—विस्तारे नाहि अन्त॥ 368॥
    अनुवाद—वैकुण्ठमें 'शेष' और अपने फणोंपर
    धरतीको धारण करनेवाले 'अनन्त'—ये मुख्य
    शक्त्यावेशावतार हैं। मुख्य शक्त्यावेशावतारोंकी भी
    संख्याका कोई अन्त नहीं है॥ 368॥
    मुख्यशक्तिके भेदसे मुख्य-आवेशावतारगण :-
    सनकाद्ये 'ज्ञान'-शक्ति, नारदे शक्ति 'भक्ति'।
    ब्रह्माय 'सृष्टि'-शक्ति, अनन्ते 'भू-धारण'-शक्ति॥ 369॥
    शेषे 'स्व-सेवन'-शक्ति, पृथुते 'पालन'।
    परशुरामे 'दुष्टनाश-वीर्यसञ्चारण'॥ 370॥
    अनुवाद—श्रीकृष्णने सनकादि चतुःसनमें
    'ज्ञान'-शक्तिका, नारदमें 'भक्ति'-शक्तिका, ब्रह्मामें
    'सृष्टि'-शक्तिका, अनन्तमें 'भू-धारण'-शक्तिका, शेषमें
    'अपनी-सेवा'-शक्तिका, पृथुमें पृथ्वीकी 'पालन'-शक्तिका
    और परशुराममें 'दुष्ट-विनाशक'-शक्तिका आवेश किया
    है॥ 369-370॥
    अमृतप्रवाह भाष्य—'शेषे स्व-सेवन'-शक्ति'—शेषरूपी
    भगवदवतारमें अपनी सेवारूपी शक्ति अर्पित हुई है॥ 370॥
    आवेशावतारकी संज्ञा :-
    लघुभागवतामृत (1/1/18)के आवेशप्रकरणमें—
    ज्ञानशक्त्यादिकलया यत्राविष्टो जनार्दनः।
    त आवेशा निगद्यन्ते जीवा एव महत्तमाः॥ 371॥
    अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 371॥
    अमृतप्रवाह भाष्य—ज्ञानशक्ति आदि कलाके द्वारा
    जिनमें भगवद्-आवेश है, उन सभी महत्तम (महान
    व्यक्तियोंमें श्रेष्ठ) जीवोंकी 'आवेश-अवतार'के रूपमें
    गणना की जाती है॥ 371॥
    अनुभाष्य—
    यत्र (महत्तमेषु जीवेषु) ज्ञानशक्त्यादिकलया (ज्ञान-भक्ति-
    सृष्टि-सेवन-पालन-धारण-विनाशनादि-भागेन) जनार्दनः आविष्टः,
    ते महत्तमाः जीवाः एव 'आवेशाः' (आवेशावताराः) निगद्यन्ते
    (कथ्यन्ते)।
    श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 371॥
    (2) गीतामें विभूतिका वर्णन :-
    'विभूति' कहिये यैछे गीता-एकादशे।
    जगत् व्यापिल कृष्णशक्त्याभासावेशे॥ 372॥
    अनुवाद—गीताके ग्यारहवें अध्यायमें वर्णित श्रीकृष्णके
    सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्तरूपमें भगवान्की जिन विभूतियोंका
    वर्णन किया गया है, उनको 'विभूति' कहते हैं।
    श्रीकृष्णके शक्त्याभासावेशसे ही जगत् व्याप्त है॥ 372॥
    अनुभाष्य—भाः 2/7/39 श्लोकमें मायाकी विभूतियोंका
    परिचय देखें॥ 372॥
    श्रीमद्भगवद्गीता (10/41-42)में :-
    यद्यद्विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
    तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥ 373॥
    अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 373॥
    अमृतप्रवाह भाष्य—जो सब जीव-विभूतिमान् और
    श्रीमान् हैं, उन्हें मेरे तेजके अंशसे उत्पन्न जानना॥ 373॥
    । 283