श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1726, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 20/345-353 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य—विदेहराज निमिके द्वारा 'किस युगमें
किस वर्णको धारण करके किस-किस विधिके द्वारा
श्रीभगवान् पूजित होते हैं?'-इस विषयमें जिज्ञासा
करनेपर नवयोगेन्द्रोंमेंसे एक करभाजन-ऋषि कलियुगमें
भावी अवतारी श्रीगौरसुन्दरको प्रणाम करके कलियुगके
गुण और माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं—
यत्र (कलौ) सङ्कीर्त्तनेन (कीर्त्तनाख्य-भक्त्यनुष्ठानेन) एव
सर्वः स्वार्थः (सर्वपुरुषार्थः) अभिलभ्यते (सर्वतोभावेन प्राप्यते)
[अतः इति] गुणज्ञाः (कलेर्गुणं जानन्ति ये ते) आर्याः
(महात्मानः) सारभागिनः (गुणांशग्राहिणः) [तं] कलिं सभाजयन्ति
(अर्चयन्ति)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 345 ॥
पूर्ववत् लिखि यबे गुणावतारगण।
असंख्य संख्या ताँर, ना हय गणन ॥ 346 ॥
अनुवाद—जैसा कि मैंने गुणावतारोंका वर्णन करते
हुए कहा था, वैसे ही युगावतारोंको भी असंख्य मानना
चाहिये, इनकी भी गणना नहीं की जा सकती ॥ 346 ॥
श्रीगौरलीला-तत्त्वज्ञ, श्रीकृष्णभजनमें चतुर सनातन :—
चारियुगावतारे एइ त' गणन।”
शुनि' भङ्गि करि' ताँरे पुछे सनातन ॥ 347 ॥
अनुवाद—इस प्रकार मैंने चारों युगोंके अवतारोंका
वर्णन किया है।” महाप्रभुकी बातें सुनकर श्रीसनातन
गोस्वामीने परोक्षरूपमें इङ्गित करते हुए उनसे पूछा ॥ 347 ॥
स्वयं महाप्रभुके श्रीमुखसे महाप्रभुके अवतारके
उद्देश्यकी निर्भीक जिज्ञासा :—
राजमन्त्री सनातन-बुद्धये बृहस्पति।
प्रभुर कृपाते पुछे असङ्कोच-मति ॥ 348 ॥
“अति क्षुद्र जीव मुञि नीच, नीचाचार।
केमने जानिब कलिते कोन् अवतार?” ॥ 349 ॥
अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी राजमन्त्री थे, वे
देवताओंके गुरु बृहस्पतिके समान बुद्धिमान थे। महाप्रभुकी
कृपासे उन्होंने निःसङ्कोच होकर महाप्रभुसे पूछा,-“मैं
अत्यन्त क्षुद्र जीव हूँ, नीच हूँ और नीच आचरण
करनेवाला हूँ। मैं कैसे जानूँगा कि कलियुगमें कौन
अवतार है?” ॥ 348-349 ॥
महाप्रभुके द्वारा कलियुगके अवतारका परिचय देना :—
प्रभु कहे,-“अन्यावतार शास्त्रद्वारा जानि।
कलिते अवतार तैछे शास्त्रद्वारा मानि ॥ 350 ॥
शास्त्रके आलोकमें ही भगवद्-ज्ञानकी प्राप्ति :—
सर्वज्ञ मुनिर वाक्य—शास्त्र-'प्रमाण'।
आमा-सबा जीवेर हय शास्त्रद्वारा 'ज्ञान' ॥ 351 ॥
अनुवाद—महाप्रभुने कहा, - “जिस प्रकार शास्त्रके
द्वारा अन्य युगोंके अवतारोंके विषयमें जाना जाता है,
उसी प्रकार कलियुगके अवतारके विषयमें भी शास्त्रके
वचनोंके द्वारा ही जानना चाहिये। सर्वज्ञ मुनि (श्रीव्यासदेव)
के द्वारा प्रकाशित शास्त्र ही प्रमाण हैं। शास्त्रोंके द्वारा
ही सब जीवोंको ज्ञानकी प्राप्ति होती है ॥ 350-351 ॥
परोक्षवाद ही अवतारको प्रिय; लक्षणोंके द्वारा तत्त्वको
जाननेवालोंके द्वारा वस्तु-निर्देश :—
अवतार नाहि कहे,–‘आमि अवतार’।
मुनि सब जानि' करे लक्षण-विचार ॥ 352 ॥
अनुवाद—अवतार स्वयं नहीं कहते,-'मैं अवतार
हूँ।' श्रीव्यासमुनि सबकुछ जानते हैं, इसलिये उन्होंने
अवतारोंके लक्षणोंका शास्त्रोंमें वर्णन किया है ॥ 352 ॥
जीवके लिये दुःसाध्य; अतिशय वीर्यके द्वारा
विष्णुत्तत्त्वकी उपलब्धि :—
श्रीमद्भागवत (10/10/34)में—
यस्यावतारा ज्ञायन्ते शरीरिष्वशरीरिणः।
तैस्तैस्तुल्यातिशयैर्वीर्यैर्देहिष्वसङ्गतैः ॥ 353 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 353 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-प्राकृत-शरीररहित अप्राकृत शरीरी
परमेश्वरका अवतार-तत्त्व जीवोंके लिये दुःसाध्य है;
अतुल, अतिशय और अलौकिक वीर्यके द्वारा ही उस
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