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सर्वकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1723, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1723

बीसवाँ अध्याय 20/325-333 ]
भ्राता; (5) रैवत-तामसके सहोदर; (6) चाक्षुष-चक्षुके
पुत्र; (7) वैवस्वत-विवस्वान् सूर्यके पुत्र; (8) सावर्णि-
सूर्यके औरससे छायाके गर्भसे उत्पन्न पुत्र; (9)
दक्षसावर्णि-वरुणके पुत्र; (10) ब्रह्मसावर्णि-उपश्लोकके
पुत्र; (11-14) रुद्रसावर्णि (रुद्रके पुत्र), धर्मसावर्णि
(रुचिके पुत्र), देवसावर्णि (सत्यसाहाके पुत्र) और
इन्द्रसावर्णि (भूतिके पुत्र) हैं॥ 325-328 ॥
(ङ) युगावतार-वर्णन :-
युगावतार एबे शुन, सनातन।
सत्य-त्रेता-द्वापर-कलि-युगेर गणन ॥ 329 ॥
अनुवाद-हे सनातन, अब युगावतारोंके विषयमें
श्रवण करो। सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग-ये
चार युग हैं॥ 329 ॥
चारों युगोंमें चार वर्णोंके अवतार :-
शुक्ल-रक्त-कृष्ण-पीत-क्रमे चारि वर्ण।
चारिवर्ण धरि' कृष्ण करेन युगधर्म ॥ 330 ॥
अनुवाद-सत्य, त्रेता, द्वापर और कलिमें क्रमशः
शुक्ल (श्वेत), रक्त (लाल), कृष्ण (काला) और पीत
(पीला) वर्ण धारण करके श्रीकृष्ण युगधर्मकी स्थापना
करते हैं॥ 330 ॥
अनुभाष्य-सत्ययुगमें-शुक्लवर्ण युगावतार,
त्रेतायुगमें-रक्तवर्ण युगावतार, द्वापरयुगमें-कृष्णवर्ण
युगावतार और कलियुगमें-पीतवर्ण युगावतार; इन चार
प्रकारके वर्णोंको धारण करके श्रीकृष्ण युगावतार-धर्मकी
रक्षा करते हैं॥ 330 ॥
श्रीमद्भागवत (10/8/13)में :-
आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य गृह्णतोऽनुयुगं तनुः।
शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः॥ 331 ॥
अनुवाद-[गर्गाचार्यने श्रीनन्द महाराजसे कहा-]
तुम्हारा यह बालक अन्य तीन युगोंमें शुक्ल, रक्त और
पीतवर्ण धारण करता है। अभी द्वापर युगमें इसने
कृष्णवर्ण धारण किया है॥ 331 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 3/36 संख्या देखें ॥ 331 ॥
सत्यमें ब्रह्मचारी वेशमें शुक्लवर्णके चतुर्भुज भगवान् और
त्रेतामें रक्तवर्णवाले चतुर्भुज भगवान् :-
सत्ययुगे ध्यान-कर्म कराय 'शुक्ल'-मूर्त्ति धरि'।
कर्द्दमके वर दिला यें'हो कृपा करि' ॥ 332 ॥
कृष्ण-'ध्यान' करे लोक ज्ञान-अधिकारी।
त्रेतार धर्म 'यज्ञ' कराय 'रक्त'-वर्ण धरि' ॥ 333 ॥
अनुवाद-सत्ययुगमें भगवान् 'शुक्ल'-वर्ण धारण
करके ध्यान-कर्मको संस्थापित करते हैं। उन्होंने ही
कृपा करके कर्द्दम ऋषिको वर प्रदान किया था।
ज्ञानके अधिकारी व्यक्ति सत्ययुगमें श्रीकृष्णका 'ध्यान'
करते हैं। त्रेतायुगमें भगवान् 'रक्त'-वर्ण धारण करके
त्रेताके युगधर्म 'यज्ञ'को स्थापित करते हैं॥ 332-333 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-'कर्द्दम'-प्रजापति, जिन्होंने मनुकी
कन्या देवहूतिसे विवाह किया और जिनके पुत्र
कपिलदेव हैं। उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्ने
शुक्ल-मूर्तिमें उन्हें दर्शन दिया था॥ 332 ॥
अनुभाष्य-(भाः 11/5/21)-
"कृते शुक्लश्चतुर्बाहुर्जटिलोवल्कलाम्बरः।
कृष्णाजिनोपवीताक्षान् विभ्रद्दण्डं कमण्डलुम्॥"
[अर्थात् “सत्ययुगमें भगवान्के श्रीविग्रहका रङ्ग
श्वेत होता है। उनकी चार भुजाएँ और सिरपर जटा
होती है तथा वे वल्कलका ही वस्त्र पहनते हैं। वे
काले मृगका चर्म, यज्ञोपवीत, माला, दण्ड और
कमण्डलु धारण करते हैं। उनका ब्रह्मचारी वेश होता
है।"] भाः 3/21/16, 35, 51, 3/22/19, 3/23/23,
5/10/16 देखें। (भाः 11/5/24)-
"त्रेतायां रक्तवर्णोऽसौ चतुर्बाहुस्त्रिमेखलः।
हिरण्यकेशस्त्रय्यात्मा स्रुक्स्रुवाद्युपलक्षणः॥"
। 277