श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1719, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय 20/307-311 ]
रुद्ररूपको धारण करते हैं। विष्णुमें सत्त्वगुणका अधिष्ठान
स्वीकृत होनेपर भी उनकी मायाकी अधीनता सम्भवपर
नहीं है। जहाँ विष्णुत्वका अभाव है, वहाँ शिवत्व
अथवा ब्रह्मत्व है; उनमें मायाका संयोग है। शिवत्व
और ब्रह्मत्व-विष्णुमायाके वशीभूत हैं॥ 307 ॥
रुद्रके भेदाभेद-प्रकाश होनेकी उपमा-
दूध और दहीका दृष्टान्त :-
दुग्ध येन अम्लयोगे दधिरूप धरे।
दुग्धान्तर वस्तु नहे, दुग्ध हैते नारे ॥ 309 ॥
अनुवाद-दूध जैसे अम्लके संयोगसे दही बन
जाता है और दही दूधसे पृथक् स्वतन्त्र वस्तु नहीं है,
परन्तु दही दूध भी नहीं है अर्थात् दूधके स्थानपर
उसका प्रयोग नहीं किया जा सकता॥ 309 ॥
अनुभाष्य- 'रुद्र' - विष्णुके साथ भेदाभेदतत्त्व हैं;
मायाके सङ्गसे विकार प्राप्त करनेसे विष्णुसे 'भिन्न' हैं
और स्वयं वस्तुतः विष्णुके साथ अभिन्न हैं। 'विष्णु'-
विष्णुके साथ कभी भी भिन्न नहीं हैं, किन्तु मायाके
वशके कारण शिव और ब्रह्मादि-विष्णुसे भिन्न हैं।
विष्णु कभी भी विकारी नहीं है। जहाँ ईश्वरत्वमें
मायिक विकार दिखलायी देता है, वहाँ विष्णुसे
भिन्नरूप-गुणावतार कहलानेवाले शिव अथवा ब्रह्मा हैं।
इसलिये रुद्र विकारयुक्त भेदाभेदप्रकाश जीवतत्त्व हैं, वे
स्वरूपतः श्रीकृष्णस्वरूप विष्णुत्तत्त्व नहीं, परन्तु वैष्णवतत्त्व
हैं। ईश्वररूपी दूध मायारूपी अम्लके संयोगसे दूधकी
अवस्थासे दूधके विकार दहीके रूपमें परिवर्तित होनेपर
यह दही दूधसे उत्पन्न होनेपर भी उसे कभी भी दूध
नहीं कहा जा सकता॥ 308-309 ॥
ब्रह्मसंहिता (5/45) में :-
क्षीरं यथा दधि विकारविशेषयोगात्
संजायते न तु ततः पृथगस्ति हेतोः।
यः शम्भुतामपि तथा समुपैति कार्याद्-
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ 310 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 310 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-विशेष विकारके (अम्लके)
संयोगसे दूध जिस प्रकार दही बन जाता है, विकारके
अतिरिक्त उसमें और कोई कारण नहीं है, उसी प्रकार
जो आदिपुरुष गोविन्द कार्यवशतः शम्भुता ग्रहण करते
हैं, मैं उनका भजन करता हूँ॥ 310 ॥
अनुभाष्य-
क्षीरं (दुग्धं) यथा विकारविशेषयोगात् (अम्लसंयोगेन) दधि
संजायते (दधिरूपेण परिणमते), ततः हेतोः (क्षीरात् अपि तु)
न पृथक् (भिन्नम्) अस्ति; तथा कार्यात् (प्राकृत-विश्वसंहारार्थं
गुणमायासाङ्गज-विकारात्) यः पुरुषः (गर्भोदकशायी विष्णुः)
शम्भुतां (रुद्रत्वम्) अपि समुपैति (गृह्णाति) तम् आदिपुरुषं
गोविन्दम् अहं भजे।
श्लोक-भावानुवाद-दूध जिस प्रकार अम्लके
संयोगसे दही बन जाता है, तथापि दही दूधसे भिन्न भी
नहीं है, उसी प्रकार प्राकृत विश्वके संहारके लिये
मायाके सङ्गरूप विकारके द्वारा जो गर्भोदकशायी विष्णु
शम्भुता (रुद्रत्व) ग्रहण करते हैं, मैं उन आदिपुरुष
गोविन्दका भजन करता हूँ॥ 310 ॥
रुद्र और विष्णुमें भेद :-
'शिव'-मायाशक्तिसङ्गी, तमोगुणावेश ।
मायातीत, गुणातीत 'विष्णु'-परमेश ॥ 311 ॥
अनुवाद-शिव मायाशक्तिके सङ्गी हैं और उनमें
तमोगुणका आवेश होता है। किन्तु विष्णु मायातीत और
गुणातीत होनेके कारण परमेश्वर हैं॥ 311 ॥
अनुभाष्य- 'भगवान् विष्णु'-त्रिगुणातीत और अपनी
मायाके द्वारा कभी भी परास्त न होनेवाले स्वतन्त्र
परमेश्वर वस्तु हैं। शिव स्वरूपतः भागवत होनेपर भी
त्रिगुणमेंसे एक तमोगुणके अधीश्वर होकर मायासे
सम्बन्धयुक्त और मायाशक्तिके सङ्गबलसे उससे जुड़े
हुए हैं। भगवान् विष्णुमें मायाका अस्तित्व नहीं है;
मायाके अस्तित्वकी अनुभूतिमें ही शिवकी सत्ता है,
इसलिये रुद्र विष्णुत्तत्त्व नहीं होकर मायासे घनिष्टरूपसे
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